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Archive | पर्यावरण

Climate Agenda and Greenpeace India demands Regional Action Plan to control air pollution in Uttar Pradesh

Posted on 14 December 2017 by admin

press-conference-lucknow-14th-decAir Quality across Uttar Pradesh equally bad as Delhi but may have more severe impacts in absense of robost air quality monitoring and action plans to combat it

Lucknow,14th December 2017| The Climate Agenda and Greenpeace India held a joint press conference at U.P. Press Clubon 14th December 2017 to highlight the Rising Air Pollution levels and Health crisis across Uttar Pradesh.

While Delhi has been in the headlines for one of the worst air pollution crisis in its history, Uttar Pradesh, the densely populated State of India bordering Delhi, is also witnessing hazardous air pollution levels. November monthly average PM2.5 levels across prominent cities where real time monitoring of air pollution levels is done such as Varanasi (183), Lucknow (233), Kanpur (306), Noida (244), Ghaziabad (336), Agra (190) and Moradabad (272) are constantly beyond sever levls at three to five times the prescribed limits by CPCB (60) and eight to 12 times the WHO (25) prescribed standards. The avrage PM2.5 levels during the same time across Delhi were monitored to be at 251 µg/m3.

“Hazardous pollution levels are not just restricted to Delhi. Entire north India is grappling with a virtual public health emergency. The problem is quite severe. And yet we are looking at Delhi’s pollution scenario alone by turning a blind eye to health of people living across other regions exposed to equally hazardous pollution levels. Uttar Pradesh is a classic case of this. There are other cities in the Indo-Gangetic plains spanning right from Punjab going all the way to UP and Bihar that are just as polluted as Delhi. This clearly depicts that air pollution is a regional issue and solution to this lies in acting in a coordinated and systematic way across regions rather than limiting it to a few city centers such as Delhi.,” said Sunil Dahiya, Senior Campaigner, Greenpeace India.

The PM2.5 levels across Uttar Pradeshare constantly in very poor category and have breached the sever category several time similar to Delhi over past two months. Contrary to Delhi where at certain intervals during past two months pollution watchdog and Governmnet at-least direted some actions to cutdown hazardous air pollution levelsunder GRAP, ranging from shutting down Badarpur thermal power plant to closure orders to industries, increasing parking fees for vehicles, banning of construction activities and open waste burning, Uttar Pradesh was breathing the toxic fumes day in day out without any strong ations to safeguard public health.

Ravi Sekhar from The Climate Agenda concuded by saying that, “The impact of air pollution on human health has been studied extensively. But to make air pollution an issue among masses and to tell hem what they are breathing in, we need to have a robost air quality monitoring network across the state. We have passed the stage of merely debating about air pollution, short term measures such as graded response action plan (GRAP) similar to Delhi should also be implemented in other northern cities across Uttar Pradesh. Lucknow has shown an intent to copy and implement the Delhi GRAP in Delhi but the actions plan needs to be precautionary rather than reactionary as well as it shouldn’t just be a piece of paper and should be implemented in it’s eternity. There is an urgent need to implement strict, time-bound action plan to address various sources of air pollution across the state. We need an ambitious and systematic clean air action plan with focused and precise targets, clear timelines and demonstrable accountability towards public health. This should address the root causes of the problem,”.

For further details please contact-
Ravi Sekhar, The Climate Agenda, 8127401252, lokavidya.singrauli@gmail.com
Sunil Dahiya, Senior Campaigner, Greenpeace India, 9013673250, sunil.dahiya@greenpeace.org

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कारागार प्रशिक्षण संस्थान में राज्यमंत्री द्वारा पहली बार हुआ वृक्षारोपण

Posted on 06 June 2017 by admin

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर कारागार राज्यमंत्री श्री जयकुमार सिंह ‘‘जैकी’’ द्वारा डॉ0 सम्पूर्णानन्द कारागार प्रशिक्षण संस्थान, लखनऊ में वृक्षारोपण कर इतिहास रचा गया। बताया गया है कि संस्थान के इतिहास में पहली बार कारागार राज्यमंंत्री द्वारा वृक्षारोपण के कार्यक्रम में भाग लिया गया है। कारागार राज्यमंत्री के निर्देश पर प्रदेश के विभिन्न कारागारों के प्रांगणों में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कारागार राज्यमंत्री ने संस्थान के प्रांगण में नवनिर्मित हो रहे कारागार मुख्यालय के भवन का भ्रमण किया तथा अब तक कराये गयेे कार्याे का गहनता से निरीक्षण किया। उन्होंने निर्माण कार्याे में गुणवत्ता सुनिश्चित करते हुये समय से निर्माण कार्य पूरा करने के निर्देश दिये है। उन्होंने परिसर में नवनिर्मित जिम का भी निरीक्षण किया एवं उपकरणों की गुणवत्ता परखी।
इस अवसर पर पुलिस महानिरीक्षक, कारागार श्री पी0के0 मिश्रा, संस्थान के प्रभारी एवं उपमहानिरीक्षक कारागार श्री वी0के0 जैन सहित अन्य अधिकारियों ने भाग लिया।

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गोमती नदी अध्ययन एवं तटवासी जनजागरण पदयात्रा

Posted on 04 March 2013 by admin

सिटिजन फाॅर सस्टेनेबुल डेवलपमेण्ट (सी0एफ0एस0डी0) के संस्थापक अध्यक्ष, भूतपूर्व पी0सी0एस0 चन्द्र भूषण पाण्डेय, पर्यावरणविद ने बताया कि संस्था द्वारा, दिनांक 05 मार्च, 2013 से एक 11 दिवसीय गोमती नदी अध्ययन एवं तटवासी जनजागरण पदयात्रा निकाली जा रही है।
अध्ययन दल, मारकण्डेय महादेव, गंगा-गोमती संगम, गाजीपुर से शुरू होकर जौनपुर, सुल्तानपुर, फैजाबाद, बाराबंकी होते हुए लखनऊ पहुॅचेगा। अध्ययन के दौरान अध्ययन दल लगभग 300 किमी0 की यात्रा करते हुए, 200 गाॅवों में जनसंवाद स्थापित करेगा। यात्रा अवधि में 25 गोष्ठिया की जाएगी।
अध्ययन दल प्रत्येक 3 किमी0 पर सी0एफ0एस0डी0 रिवर फ्रेण्ड क्लब के सदस्य के रूप में 100 गोमती मित्रों की तैनाती करेगा जो नदी साक्षरता तथा संस्था की माॅगों को कार्यरूप में बदलने के लिए आवष्यक वातावरण का निर्माण करेगा।
संस्था के द्वारा अध्ययन में प्राप्त तथ्यों पर रिपोर्ट तैयार कर विष्व जल दिवस पर मा0 राष्ट्रपति भारत सरकार तथा महामहिम राज्यपाल उ0प्र0 को प्रेषित करेगा। संस्था अपनी रिपोर्ट ‘‘नदी की व्यथा’’ शीर्षक स्मारिका में प्रकाषित करेगा। सी0एफ0एस0डी0 का मानना है नदी स्वास्थ रक्षा के लिए जनान्दोलन खड़ा करना एक मात्र समाधान है। संस्था द्वारा इस क्रम विगत एक दषक से यमुना, गंगा, सई तथा इस वर्ष  गोमती नदी के तटवासियों को जागृत करने का अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान का संक्षिप्त विवरण निम्नवत हैः-

अवधि:- 5 मार्च 2013 से 16 मार्च 2013 (11 दिवसीय)
सम्मिलित जनपद- गाजीपुर, जौनपुर, सुल्लतानपुर, फैजाबाद तथा बाराबंकी से गुजरते हुए लखनऊ।
पद यात्रा की दूरी:- लगभग 300 किमी0
पद यात्रा में सम्मिलित गांव:- नदी के दाहिने तट के लगभग 200 गांव।

अध्ययन दल के जिला मुख्यालयों पर पहुॅचने का कार्यक्रम निम्नवत् है:-

ऽ    गाजीपुर-मारकण्डेय महादेव (गंगा-गोमती संगम) गाजीपुर    -5 मार्च, 2013 (पूर्वाह्न 10 बजे)
ऽ    जौनपुर-गोमती तट (षाहीपुल)                 -7 मार्च, 2013 (पूर्वाह्न 3 बजे)
ऽ    सुल्लतानपुर गोमती तट (पपर्यावरण-पार्क)            -11 मार्च, 2013 (पूर्वाह्न 3 बजे)
ऽ    लखनऊ गोमती तट                     -16 मार्च, 2013 (पूर्वाह्न 3 बजे)

अध्ययन दल का नेतृत्व चन्द्र भूषण पाण्डेय जिला उद्यान अधिकारी/पर्यावरणविद द्वारा किया जाएगा। इस दल में आषीष सिंह, अमरेज बहादुर, के0 के0 सिंह तथा जिलाजीत प्रमुख रूप से सम्मिलित रहेगें। इसके अलावा विभिन्न जनपदो के कार्यकर्ता एवम् नागरिक भी सम्मिलित होते रहेंगे।

सिटिजन फाॅर सस्टेनेबुल डेवलपमेण्ट सोसाइटी (सी0एफ0एस0डी0) द्वारा गंगा, यमुना, घाघरा, गोमती एवं सई नदी प्रणाली का विगत आठ वर्षों से निरन्तर गहन परीक्षण, विष्लेषण तथा अवलोकन किया जा रहा है। अध्ययन के दौरान संस्था को जो तथ्य मिले उसके आधार पर उक्त नदी प्रणालियों के अक्षुण्ण भविष्य के लिए (पूर्ण नीरा, सदा नीरा तथा पवित्र नीरा) निम्नानुसार माँग भारत सरकार तथा अन्य सम्बन्धित संस्थाओं के समक्ष निरन्तर रखी जा रही हैं-
    सीवेज/स्लज को नदी में प्रवेष करने से रोका जाय। सीवेज को उपचार संयंत्रों के माध्यम से षत प्रतिषत उपचारित करके जल सिंचाई हेतु कृषकों को उपलब्ध कराया जाये।
    श्मषाम घाटों को अनिवार्यतः विद्युतीकृत शवदाह गृहों में रूपान्तरित किया जाये तथा प्रतीक रूप में ही राखो का विसर्जन नदी में किया जाय।
    परम्परागत श्मषाम घाटों को नदी तटों से विस्थापित किया जाये। नदी तटों पर केवल विद्युतीकृत शवदाह गृहों को ही अनुमति प्रदान की जाये।
    औद्योगिक अपषिष्टों के नदी में प्रवाहित होने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया जाये।
    नदी से जल निकासी का नियमन किया जाय तथा जल चोरी पर कड़ी निगरानी रखी जाय।
    नदी को सदा नीरा, पूर्ण नीरा तथा पवित्र नीरा बनाये राने हेतु नदी में बाँध न बनाये जाये।
    नदी को डस्टबिन न मानते हुए एक जीवन्त प्रणाली माना जाय तथा उसके जीवन से खिलवाड़ बन्द किया जाय।
    जल पुलिस का गठन किया जाय। जल थानों एवं पुलिस चैकियों की स्थापना किया जाय।
    प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली के संस्थागत रूप को और प्रभावी बनाया जाय।
    समस्त नदी जल स्रोतों का मात्रात्मक एवं गुणात्मक डेटाबेस बनाया जाय तथा इसकी निगरानी मासिक आधार पर किया जाय एवं इसकी सूचना दैनिक समाचार पत्रों एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से जन मानस के समक्ष प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया जाये।
    प्रदूषण नियंत्रण में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु संस्थागत विकास किया जाए।
    नदियों में मिलने वाले नालों पर चेकडैम बनाये जायें तथा वर्षा काल में नदी के पूर्ण नीरा होने के उपरान्त नालों के चैनल बन्द कर दिया जाय। जो जल अभाव की दषा में उपयोग में लाया जाये जिससे नदी जल उपयोग पर दबाव कम होगा।
    नदी में प्रदूषण करने के अपराध के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान किया जाय तथा पर्यावरणीय अपराधों के लिए विषेष न्यायालय बनाये जाये। जिसमें न्यायाधीष के रूप में पर्यावरणविदों को नियुक्त किया जाय।

यदि समय रहते उपर्युक्त सुझावो पर अमल नही किया गया तो वैदिक नदी सरस्वती की तरह गोमती भी काल के गाल में समा जाये तो आष्चर्य नही होगा। विगत 60 वर्षो में आदि गंगा गोमती दो तिहाई जल खो चुकी हैं तथा अवषेष एक तिहाई जल को समाप्त होने में मात्र 30 वर्ष लगेगा। आदि गंगा गोमती विलख रही है अपने जीवन की अन्तिम सांसे गिन रही है। पतित पावनी गोमती मानव के पापो के बोझ के तले ऐसी दबी हुई है जैसे लगता है कि इस कलयुगमें असहाय द्रौपदी तारण हार श्री कृष्ण की बाट जोह रही है। आज की यमुना रीवर नही सीवर है। गोमती की सहायक क्वारी नदी सूख चुकी है। गोमती भी सूखने वाली है गोमती के सूखने के साथ ही हमारी एक बहुत बड़ी सांस्कृतिक धरोहर सूख जायेगी गोमती के दोनों तटों पर बसे एक लाख से अधिक परिवारो की रोटी भी सूख जायेगी। गोमती माता के सूखने के साथ ही पतित पावनी गंगा भी शायद ही गंगा सागर पहुंच पायेगी।
अतः नदी तटवासियों एवं प्रषासन से अनुरोध है कि उपर्युक्त बिन्दुओं को प्राथमिकता के आधार पर संज्ञान लेते हुए आवष्यक नीतिगत एवं वैधानिक तथा प्रषासनिक बदलाव के लिए आवष्यक वातावरण बनाने तथा तद्नुसार कार्यवाही करवाने में अपनी भूमिका अदा करने की कृपा करें।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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अवैध कटान पर गम्भीर रुख

Posted on 21 November 2012 by admin

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने वृक्षों की अवैध कटान पर गम्भीर रुख अपनाते हुए नानपारा बहराइच के तत्कालीन उप प्रभागीय वनाधिकारी श्री बिन्दु गोपाल उपाध्याय को निलम्बित कर उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रारम्भ करने के निर्देश दिये हैं। इसी प्रकरण में तत्कालीन क्षेत्रीय वनाधिकारी रुपईडीहा रेंज श्री देवेन्द्र बहादुर सिंह, करियागांव बीट के तत्कालीन सेक्शन प्रभारी वन दरोगा श्री महेश कुमार तथा करियागांव बीट के तत्कालीन वन रक्षक श्री अशोक कुमार सिंह को भी निलम्बित किया गया है। करियागांव बीट के एक अन्य तत्कालीन वन रक्षक श्री नवल किशोर मिश्रा को कारण बताओ नोटिस जारी की गई है। मामले में बहराइच के तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी डाॅ0 राम खेलावन सिंह की संलिप्तता भी पाई गई, जो एक अन्य प्रकरण में भी दोषी पाए जाने पर पूर्व में मई, 2012 में निलम्बित कर दिए गए थे।
ज्ञातव्य है कि बहराइच वन प्रभाग की रुपईडीहा रेंज की करियागांव बीट के मस्जिदिया में वृक्षों की अवैध कटान की स्थलीय जांच प्रभागीय निदेशक, सामाजिक वानिकी वन प्रभाग, बाराबंकी के नेतृत्व में गठित पांच सदस्यीय काॅम्बिंग टीम से कराई गई। स्थलीय जांच में विभिन्न प्रजातियों के कुल 269 वृक्षों की कटान पाई गई, जिनका विभागीय अनुसूचित दर से मूल्य 20 लाख 40 हजार 530 रुपए है। इस जांच के क्रम में श्री बिन्दु गोपाल उपाध्याय के अतिरिक्त तत्कालीन क्षेत्रीय वनाधिकारी रुपईडीहा रेंज (वर्तमान में मथुरा वन प्रभाग के गोवर्धन रेंज में तैनात) श्री देवेन्द्र बहादुर सिंह, करियागांव बीट के तत्कालीन सेक्शन प्रभारी वन दरोगा श्री महेश कुमार तथा करियागांव बीट के तत्कालीन वन रक्षक श्री अशोक कुमार सिंह को भी निलम्बित किया गया है। इसके अलावा करियागांव बीट के एक अन्य तत्कालीन वन रक्षक श्री नवल किशोर मिश्रा को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।
यह भी ज्ञातव्य है कि शिकायतों की प्रथम दृष्टया जांच में यह पाया गया कि श्री उपाध्याय ने उप प्रभागीय वनाधिकारी, नानपारा बहराइच के पद पर तैनाती के दौरान न तो वृक्षों की अवैध कटान की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दी और न ही अवैध कटान को रोकने के लिए कोई सार्थक प्रयास ही किया। इस प्रकार उन्होंने अपने कर्तव्यों के प्रति घोर लापरवाही एवं उदासीनता बरती। निलम्बन अवधि में श्री उपाध्याय प्रमुख वन संरक्षक कार्यालय से सम्बद्ध रहेंगे। प्रकरण की सघन जांच के लिए मुख्य वन संरक्षक गोरखपुर मण्डल श्री आर0आर0 जमुआर को नामित किया गया है। वर्तमान में श्री बिन्दु गोपाल उपाध्याय बलरामपुर, गोण्डा वन प्रभाग में उप प्रभागीय वनाधिकारी के पद पर तैनात है।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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पर्यावरण संरक्षण और नदियों को बचाने की दिशा में कार्य करना सभी की जिम्मेदारी: मुख्यमंत्री

Posted on 08 October 2012 by admin

प्रदेश में गंगा और उसकी सहायक नदियों में डाॅल्फिन की संख्या 671
‘मेरी गंगा, मेरी डाॅल्फिन’ अभियान का समापन

press-1उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने कहा है कि पर्यावरण संरक्षण और नदियों को बचाने की दिशा में कार्य करना सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि नदियों को बचाने के लिए गम्भीरता से प्रयास किये जाने चाहिए।
मुख्यमंत्री आज यहां अपने सरकारी आवास 5, कालिदास मार्ग पर आयोजित ‘मेरी गंगा, मेरी डाॅल्फिन’ अभियान के समापन समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने डाॅल्फिन गणना-2012 की जानकारी देते हुए बताया कि प्रदेश में गंगा और उसकी सहायक नदियों में डाॅल्फिन की संख्या बढ़कर 671 हो गई है।
ज्ञातव्य है कि डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया ने प्रदेश के वन विभाग के साथ मिलकर, एच0एस0बी0सी0 के सहयोग से गंगा और उसकी सहायक यमुना, सोन, केन, बेतवा, घाघरा और गेरुआ नदियों में डाॅल्फिन की संख्या का सर्वेक्षण करने के लिए 05 अक्टूबर से 07 अक्टूबर, 2012 तक एक अभियान संचालित किया था। गंगा नदी की डाॅल्फिन एक शीर्ष स्तरीय जल जीव है, जो एक तरफ मछली एवं अन्य छोटी प्रजातियों के जीवों की आबादी को नियंत्रित करती है, वहीं दूसरी तरफ नदी की पारिस्थितिकी को संतुलित रखने में भी मददगार साबित होती है। गंगा एवं इसकी सहायक नदियों में डाॅल्फिन की मौजूदगी जहां एक ओर नदी के स्वस्थ होने का संकेत है, वहीं दूसरी ओर डाॅल्फिन की संख्या में कमी एक गम्भीर चिन्ता का विषय है।
अपने सम्बोधन में मुख्यमंत्री ने इस प्रकार के अभियानों को प्रोत्साहित किये जाने पर बल देते हुए कहा कि इस सम्बन्ध में राज्य सरकार हर तरह का सहयोग प्रदान करने के लिए तैयार है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूकता लाने हेतु ईको टूरिज्म को बढ़ावा देने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि किसान जैव उर्वरकों को अपनाएं, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
press4इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने श्री अखिलेश कुमार, श्री चन्द्रभान सिंह तथा श्री बृजेन्द्र सिंह को ‘डाॅल्फिन एम्बेसेडर’ का सम्मान भी प्रदान किया।
प्रदेश के प्रमुख वन संरक्षक (वन्य जीव) श्री रूपक डे ने इस अवसर पर ‘मेरी गंगा, मेरी डाॅल्फिन’ अभियान की पृष्ठभूमि पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वन विभाग के 20 प्रभागों केे अधिकारियों व कर्मचारियों एवं 18 स्वयंसेवी संस्थाओं ने इस तीन दिवसीय अभियान को संचालित करने में सहयोग प्रदान किया।
एच0एस0बी0सी0 की प्रमुख श्रीमती नैना लाल किदवई ने अपने सम्बोधन में जल संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डाला और गिरते भू-जल स्तर पर चिन्ता व्यक्त की। कार्यक्रम में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया के सी0ई0ओ0 श्री रवि सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किये। प्रमुख वन संरक्षक श्री जे0एस0 अस्थाना ने अतिथियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस अवसर पर राज्य मंत्री जन्तु उद्यान श्री शिव प्रताप यादव, उपाध्यक्ष राज्य योजना आयोग श्री एन0सी0 बाजपेई, सचिव वन श्री आर0के0 सिंह सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति भी मौजूद थे।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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जीवन के लिए नदियाँ, नदियों के लिए जीवन

Posted on 05 October 2012 by admin

dolphin4-hi-res-francois-xavier-pelletier-wwf-canon-1भारत की संरक्षण संगठनों में एक प्रमुख संगठन डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया जिनके कार्यक्रम एवं परियोजनाऐं पूरे देश में प्रसारित हैं, उत्तर प्रदेश वन विभाग की भागीदारी और एचएसबीसी समर्थित कार्यक्रम ’’जीवन के लिए नदियाँ, नदियों के लिए जीवन’’ के तत्त्वाधान में तीन दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम, ‘‘मेरी गंगा, मेरी डाॅल्फिन’’ की अगुवाई कर रही है। यह कार्यक्रम उत्तर प्रदेश और आस-पास के इलाकों में 5 से 7 अक्टूबर 2012 तक चलाया जायेगा। अभियान का मकसद 2800 किलोमीटर लम्बी गंगा नदी और इसकी सहायक नदियों जैसे यमुना, सोन, केन, बेतवा, घाघरा और गेरुआ में पाये जाने वाले डाॅल्फिनों की संख्या का पता लगाना है। इसके साथ-साथ गंगा के किनारे बसे स्थानीय समुदायों में राष्ट्रीय जलीय स्तनधारी की उपस्थिति एवं संरक्षण की महत्व के बारे में जागरूगता फैलाई जायेगी व इन जलीय स्तनपायी के संरक्षण में सहायता देने वाले साझीदारों के क्षमता निर्माण में भी मदद की जायेगी। अभियान के दौरान इन नदियों में पाये जाने वाले डाॅल्फिनों की कुल संख्या की घोषणा उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव तिथि 7 अक्टूबर, 2012 को करेंगे। उत्तर प्रदेश के माननीय परिवहन मंत्री राजा अरिदमान सिंह द्वारा इस अभियान की शुरूआत 5 अक्टूबर, 2012 को हरी झण्डी दिखाकर की जायेगी।

आमतौर पर ‘‘सुसु’’ या ‘‘सूंस’’ के नाम से प्रचलित गंगा नदी की डाॅल्फिन (प्लेटनिस्टा गैंजटिक) गंगा, ब्रह्मपुत्र एवं मेघना नदी प्रणालियों की एक स्थानीय जीव है और यह दुनिया की चार स्वच्छ जल डाॅल्फिनों में एक है। दो या इससे अधिक नदियों के संगम और इसके आस-पास के मुख्य रूप से गहरे पानी में रहने वाले यह स्तनधारी जीव मगरमच्छों, स्वच्छ जल कछुओं एवं आद्र प्रदेश में रहने वाले पक्षियों के साथ निवास करते हैं। इनमें से अधिकांश मछली भक्षक होने के कारण इनका डाॅल्फिनों के साथ संभावित प्रतिद्वन्द्वी रहती है। डाॅल्फिन नदियों की एक संकेतक जानवर है व प्रायः इसे ‘‘गंगा की बाघ’’ के नाम से जाना जाता है। एक नदी पारिस्थितिक तंत्र में इनकी स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे की जंगल में एक बाघ की है, नदियों में इसकी उपस्थिति एक स्वस्थ नदी पारिस्थितिक तंत्र की प्रतीक को दर्शाता है।
अभियान के बारे में, डाॅ. रुपक डे पीसीसीएफ (वन्य जीव), उत्तर प्रदेश वन विभाग ने बताया, ‘‘गंगा नदी की डाॅल्फिन, भारत की राष्ट्रीय जलीय जानवर एकमात्र करिश्माई जबरदस्त जन्तु और नदी पारिस्थितिक तंत्र के लिए एक संकेतक जाति है। देश में तेजी से घटते डाॅल्फिनों की संख्या एक बहुत बड़ी चिंता और इसके तरफ शीघ्र ध्यान देने की आवश्यकता है। इस ओर सबसे पहले उत्तर प्रदेश वन विभाग और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया द्वारा कदम उठाया गया, जिसका उद्देश्य स्थानीय समुदाय की संकटापन्न प्रजातियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करना है।

पिछले कुछ सालों में डाॅल्फिनों के रहने के स्थान में जबरदस्त रूप से कमी आई है। विभिन्न विकासात्मक गतिविधियों जैसे डैमों एवं बैराजों के निर्माण के परिणामस्वरूप नदी प्रवाहों का सिकुड़ना, अंधाधंुध मछली पकड़ने, वन-उन्मूलन के कारण नदियों में गाद जमना, नदियों का प्रदूषित होने व निवास स्थान विनाश के कारण इनकी संख्या पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। भारत में वर्ष 1982 के दौरान डाॅल्फिनों की अनुमानित संख्या 4000-5000 के बीच थी, लेकिन अब इनकी संख्या 2000 से भी कम है और इनकी वार्षिक अनुमानित मृत्यु दर 130-160 की संख्या के बीच है। यह स्तनधारी जीव अब भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची 1 में सूचीबद्व है एवं इसे विश्व संरक्षण संघ (आईयूसीएन) द्वारा ‘‘लुप्तप्राय’’ के रूप में वर्गीकृत किया है। इसे राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर उच्च स्तर की कानूनी संरक्षण की आवश्यकता है।

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया के नदी घाटियों एवं जल नीति के निदेशक, श्री सुरेश बाबू ने इस अभियान के बारे में बताते हुए कहा, ‘‘मेरी डाॅल्फिन, मेरी गंगा’’ कार्यक्रम का आयोजन डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया द्वारा एचएसबीसी जल कार्यक्रम एवं उत्तर प्रदेश वन विभाग के संरक्षण में किया है जिसका लक्ष्य डाॅल्फिन संरक्षण के लिए सहयोगपूर्ण कार्य पर संदेश फैलाना और पूरे उत्तर प्रदेश राज्य में एक डाॅल्फिन गणना आयोजित करना है।’’

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया ने गंगा नदी की डाॅल्फिनों को विशेष ध्यान देने वाली जाति के रूप स्वीकार किया है और इसके लिए इन्होंने 1997 में गंगा नदी डाॅल्फिन संरक्षण कार्यक्रम की शुरूआत की। इस संगठन ने देश में नेटवर्क भागीदारों के सहयोग से अब तक की इस प्रकार के जीवों की पहली वैज्ञानिक स्थिति सर्वेक्षण आयोजित किया। इस प्रक्रिया में, 20 से अधिक नदियों का सर्वेक्षण हुआ, जिसके दौरान लगभग 6000 किलोमीटर की दूरी कवर किया गया और देश के विभिन्न नदियों में विशेष रूप से गंगा नदी को ही डाॅल्फिनों की आबादी के लिए एक आदर्श निवास स्थान के रूप में पहचान हुई जिसके लिए संरक्षण कार्य की प्राथमिकता दी गई। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया ने उत्तर प्रदेश वन विभाग की मदद से उत्तर प्रदेश में गंगा नदी डाॅल्फिन संरक्षण के लिए एक रणनीति एवं कार्य योजना तैयार किया है और पूरे देश में भी गंगा नदी डाॅल्फिन संरक्षण के नेटवर्क के लिए सहयोगी बनाये हैं।

सर्वेक्षण की आवश्यकता को आयोजित करने पर जोर देते हुए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया के एसोसिएट डायरेक्टर (नदी घाटी एवं जैव विविधता), डाॅ. संदीप बेहेरा ने बताया, ‘‘डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इण्डिया ने वर्ष 2005 के दौरान उत्तर प्रदेश के नदियों में 600 नदी डाॅल्फिनों का आकलन किया। उसके बाद से, इन जीवों की कोई व्यापक गणना नहीं की गई। अब इस अभियान के अन्त तक हम उम्मीद करते हैं कि इन जीवों की वर्तमान संख्या स्थिति प्राप्त होगी और उत्तर प्रदेश में इनके संरक्षण के लिए एक कार्य योजना विकसित करेंगे।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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ओजोन परत संरक्षण

Posted on 11 September 2012 by admin

उ0प्र0 पर्यावरण निदेशालय द्वारा आगामी 16 सितम्बर  को  अन्तर्राष्ट्रीय  ओजोन परत संरक्षण दिवस के उपलक्ष्य में 15 सितम्बर पूर्वान्ह 10.30 से 12.30 बजे तक कक्षा 9 से 12 तक के स्कूली बच्चों की पोस्टर प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है। प्रतियोगिता का विषय ‘‘ओजोन परत संरक्षण’’ से संबंधित है।
यह जानकारी प्रभारी निदेशक पर्यावरण ओ0पी0वर्मा ने दी है। उन्होंने बताया कि प्रतियोगिता में प्रतिभाग करने हेतु इच्छुक बच्चे आगामी 14 सितम्बर को सायं 3.00 बजे तक निदेशालय में स्वयं अथवा doeuplko@yohoo.com या फैक्स नं0-2300543 अथवा दूरभाष सं0-2300549 पर सम्पर्क कर रजिस्टेशन करा सकते हैं। प्रतियेागिता में बच्चों को कलर लेकर आना होगा। विजेता बच्चों को 16 सितम्बर 2012 अन्तर्राष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस के अवसर पर निदेशालय में आयोजित समारोह में पुरस्कृत किया जायेगा।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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पर्यावरणीय शिक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन

Posted on 23 August 2012 by admin

पर्यावरणीय शिक्षा प्रशिक्षण व जन जागरूकता कार्यक्रम के अंतर्गत पर्यावरणीय चेतना जागृत करने हेतु जन सामान्य को उसकी सुरक्षा, संरक्षण और संवर्धन के प्रति जागरूक किये जाने का कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। इस हेतु चालू वर्ष में रू0 1000 हजार के बजट की व्यवस्था की गयी है।
प्रदेश के अनेक भागों में विविध बहुआयामी व दूरगामी प्रभाव वाली पर्यावरणीय समस्यायें जैसे वायु प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, भूस्खलन, नदियों और झीलों में जल की कमी भू-गर्भ जल भण्डारों का अति दोहन और वनस्पतिक आवरण में कमी इत्यादि विद्यमान है जो जन स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रही है। जन सामान्य को इसकी सही जानकारी कराकर ही इसके कुप्रभाव से बचाया जा सकता है, जिसके लिये विभिन्न दिवसों जैसे अन्तर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (22 मई) विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) एवं अन्तर्राष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस (16 सितम्बर) के अवसरों पर मुख्यालय एवं क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
विभिन्न लक्षित समूहों जैसे उद्यमियों, उद्योग संघों, स्वयंसेवी संस्थाओं, विकास विभाग, शिक्षकों, छात्र-छात्राओं हेतु पर्यावरण बहुविषयक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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पर्यावरण जन जागरूकता हेतु प्रशिक्षण व प्रचार-प्रसार कार्यक्रम आयोजित

Posted on 14 August 2012 by admin

पर्यावरण विभाग द्वारा ग्राम्य स्तर तक पर्यावरणीय जन जागरूकता हेतु जिला योजना के अन्तर्गत पर्यावरणीय शिक्षा, प्रशिक्षण व जन जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।
इसके अन्तर्गत मान्यता प्राप्त विद्यालयों एवं सरकारी कार्यालयों में स्थानीय प्रजाति के वृक्षों जैसे वरगद, नीम, पीपल, आंवला एवं अशोक प्रजाति के वृक्ष लगाये जा रहे हैं। इसके अलावा प्रदेश की प्रमुख नदियों, गंगा एवं दूसरी सहायक नदियों में बढ़ रहे प्रदूषण की रोकथाम और जल संरक्षण हेतु प्रचार-प्रसार सामग्री यथा प्रचार-प्रसार सामग्री तथा वुकलेट, पैम्फलेट, पोस्टर व स्टीकर इत्यादि तैयार कराकर स्कूली बच्चों और घाटों पर लगने वाले मेलों व अन्य अवसरों पर वितरण कराया जा रहा है।
पर्यावरणीय जन जागरूकता के लिये गंगा संरक्षण विषयक नुक्कड़ नाटकों का घाटों व स्कूलों पर आयोजन, मीडिया एवं आकाशवाणी, रेडि़यों, एफ0एम0 के माध्यम से गंगा संरक्षण विषयक संदेशों का प्रसारण तथा समाचार पत्र/पत्रिकाओं में गंगा संरक्षण से सम्बन्धित लेखों का प्रकाशन भी कराया जाना प्रस्तावित है।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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वन क्षेत्रों का सर्वे एवं सीमांकन कराया जा रहा है

Posted on 10 August 2012 by admin

उत्तर प्रदे’ा में आरक्षित वन क्षेत्र में अतिक्रमण एवं अवैध खनन आदि की समस्याओं पर प्रभावी नियंत्रण सुनििश्चत करने हेतु वन क्षेत्रों का सर्वे एवं सीमांकन कराया जा रहा है।
वन विभाग की सूचना के अनुसार सीमाओं के स्प”ट न होने के कारण वन क्षेत्रों को असामाजिक तत्वों/भू माफियाओं के द्वारा अतिक्रमण किये जाने की समस्या प्राय: बनी रहती है जिसके लिये आवश्यक है कि वन क्षेत्रों का सीमांकन करके सीमा स्तम्भों को लगाया जाये।
इसी प्रकार सीमा स्प”ट न होने से वन भूमि पर अवैध खनन की समस्या बनी रहती है। इस समस्या से निपटने के लिए वनों की स्टॉक मैपिंग का कार्य भी किया जा रहा है।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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