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सम्पत्ति बनाने की जगह गुणात्मक शिक्षा से प्रत्येक बच्चे को देश के लिए उपयोगी नागरिक बनायें निजी विद्यालय

Posted on 13 April 2018 by admin

लखनऊ, 13 अप्रैल। आज पूरे देश में निजी स्कूलों के प्रबन्धकों पर तरह-तरह के आरोप लग रहे है। इसके विपरीत गिनीज बुक आॅफ वल्र्ड रिकार्ड में एक ही शहर में सबसे अधिक बच्चों वाले स्कूल के रूप में दर्ज एवं वर्ष 2002 के यूनेस्को प्राइज फाॅर पीस एजूकेशन पुरस्कार से सम्मानित लखनऊ के सिटी मोन्टेसरी स्कूल के संस्थापक-प्रबंधक एवं भूतपूर्व विधायक डाॅ. जगदीश गाँधी और उनकी धर्मपत्नी डाॅ. भारती गाँधी की लगभग 59 वर्ष स्कूल संचालन के बाद भी मात्र 15,45,340.53 (पन्द्रह लाख पैंतालीस हजार तीन सौ चालीस रूपये एवं तिरपन पैसे) की सम्पत्ति देश के अन्य प्रतिष्ठित स्कूल प्रबंधकों के लिए एक उदाहरण है।

5 अप्रैल, 2018 घोषित सम्पत्ति के अनुसार इन दोनों के पास कुल मिलाकर रू0 15,45,340.53 (पन्द्रह लाख पैंतालीस हजार तीन सौ चालीस रूपये एवं तिरपन पैसे) की सम्पत्ति है। डा. जगदीश गाँधी व डा. (श्रीमती) भारती गाँधी ने घोषित किया है कि उनके पास अचल सम्पत्ति के रूप में कुछ भी नहीं है। वे विगत 59 वर्षों से किराये के मकान में रहते हैं, उनके पास अपना कोई मकान नहीं है और न ही किसी प्रकार की जमीन व प्रापर्टी आदि है। किसी भी बैंक में उनका कोई लाॅकर आदि नहीं है और न ही किसी प्रकार की विदेशी मुद्रा, सोना, चांदी अथवा किसी प्रकार के आभूषण हैं। इसके अलावा किसी भी बैंक में उनके नाम पर कोई चालू खाता (करेन्ट एकाउन्ट) नहीं है और न ही कोई फिक्स डिपाजिट है। आप दोनों प्रख्यात शिक्षाविदों ने घोषणा की है कि उपरोक्त वर्णित सम्पत्तियों के अलावा अन्य किसी भी प्रकार की कोई भी अन्य व्यक्तिगत सम्पत्ति उनके पास नहीं है। यह जानकारी डा0 गाँधी की वेबसाइट www.jagdishgandhiforworldhappiness.org पर भी उपलब्ध है।

डाॅ. गाँधी उत्तर प्रदेश की पांच वर्षों तक विधायक रहकर भी जन सेवा व समाज सेवा की है। इस अवधि में या इसके पहले या बाद में भी इन्होंने कभी भी प्रदेश सरकार या भारत सरकार से कोई आर्थिक सहायता नहीं ली है। गाँधी दम्पत्ति का जीवन एक खुली किताब की तरह है। इन्होंने सदैव ही अपने जीवन में सादगी को ज्यादा महत्व दिया है। इन दोनों का मानना है कि बच्चों की सर्वोत्तम शिक्षा ही परमात्मा की सबसे बड़ी पूजा है। इस प्रकार बच्चों की शिक्षा के माध्यम से धन कमाना इनका उद्देश्य कभी भी नहीं रहा है, अपितु बच्चों की शिक्षा के माध्यम से समाज की सेवा करना ही इनका उद्देश्य है। गाँधी दम्पत्ति द्वारा वर्ष 1959 में जिस विद्यालय को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों को पूरा करने के लिए ‘जय जगत’ के ध्येय वाक्य को अपनाते हुए मात्र 5 छात्रों से शुरू किया गया था उस विद्यालय में वर्तमान में 55,000 से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

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