Categorized | लखनऊ.

अगस्त क्रांति और समाजवादः राजेन्द्र चौधरी

Posted on 09 August 2017 by admin

भारत की आजादी के लिए और अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए पहली जनक्रांति 1857 में हुई थी। 1885 ई0 में कांग्रेस की स्थापना के वर्षों बाद उसमें लोकमान्य तिलक का प्रवेश हुआ और जनअसंतोष की आवाज उभरने लगी। सन् 1919 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन और सत्याग्रह ने लाखों लोगों को आकृष्ट किया। गांधी जी पहले ऐसे नेता थे जिनकी भारत के किसानों, गरीबों, वंचितों सहित समाज के हर वर्ग में पैठ बनी। उन्होंने अपने आंदोलनों से जनता को संगठित किया। अपने लंबे राजनीतिक संघर्ष से गांधी जी ने जनता के उत्साह को विशेषकर नौजवानों को आजादी के अन्तिम संघर्ष के लिए तैयार कर लिया था।

भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की निर्णायक लड़ाई थी। क्रिश्स मिशन की विफलता से भारत में क्षोभ की लहर थी। दूसरे महायुद्ध में जापान प्रारम्भिक तौर पर अंग्रेजों पर भारी पड़ रहा था। भारतीय जनमानस में असंतोष था। गांधी जी ने 5 जुलाई 1942 को ‘हरिजन‘ पत्र में लिखा ‘अंग्रेजों भारत को जापान के लिए मत छोड़ो, बल्कि भारतीयों के लिए भारत को व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ।‘
8 जुलाई 1942 को भारतीय नेशनल कांग्रेस कमेटी की बैठक बंबई में हुई। इसमें निर्णय लिया गया कि भारत अपनी सुरक्षा स्वयं करेगा। अंग्रेज भारत छोड़े अन्यथा उनके खिलाफ सिविल नाफरमानी आंदोलन किया जाएगा। बंबई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक में कांग्रेस के अधिवेशन में गांधी जी का ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो‘ प्रस्ताव 8 अगस्त 1942 को स्वीकार कर लिया गया। इस प्रस्ताव पर गांधी जी ने अपने भाषण में देश को ‘करो या मरो‘का मंत्र दिया।
9 अगस्त 1942 की भोर से ही कांग्रेस के सभी बड़े नेता पकड़ लिए गए। इसके बाद तो देश में भूचाल आ गया। जिसको जो सूझा उसने अपने ढंग से अंग्रेजीराज की खिलाफत शुरू कर दी। उ0प्र0 के बलिया और बस्ती में तो अस्थायी सरकारें तक स्थापित हो गई।
कांग्रेस के बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद समाजवादी विचारधारा के नेता श्री जय प्रकाश नारायण, डा0 राम मनोहर लोहिया, अरूणा आसिफ अली आदि ने आंदोलन का नेतृत्व सम्हाला। 9 अगस्त 1942 का ऐसा आंदोलन था जिसमें देश का हर वर्ग स्वतः स्फूर्त सक्रिय था।
भारत के विशाल जनांदोलन से अंग्रेज समझ गए थे कि उनकोभारत छोड़ने में अब देर नहीं होगी। इसलिए जाते-जाते उन्होंने भारत विभाजन का षड़यंत्र रच दिया। 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी की घड़ी आ गई।
आजादी के बाद भारत के समक्ष कई गंभीर चुनौतियां उठ खड़ी हुई। गांधी जी ने स्वराज के साथ ग्राम राज का जो सपना देखा था वह कांग्रेस के नए नेतृत्व को रास नहीं आया और देश उनके पश्चिमी प्रभाव वाले रास्ते पर चल पड़ा।
स्वतंत्रता आंदोलन में भारत के सभी समुदायों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था। इसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों ने अपनी कुर्बानी देकर भारत को आजाद कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आजादी के बाद शासन सŸाा में जिनके हाथ नेतृत्व आया उन्होंने उन मूल्यों एवं आदर्शों को परे रख दिया जिनके आधार पर गांधी जी ने नए भारत के निर्माण का सपना देखा था। देश में गरीबी, बीमारी, भूख, अशिक्षा, की लड़ाई मंद पड़ गई। गैर बराबरी का दैत्य सब पर भारी पड़ने लगा। जाति और संप्रदाय की राजनीति ने समाज को बांटने और सद्भाव तथा परस्पर सहयोग की भावना को धूमिल कर दिया।
भारत की आजादी के साथ ही कुछ प्रबुद्ध युवा नेतृत्व ने विचारधारा के आधार पर राजनीति चलाने का मन बना लिया था। इस देश की माटी और परम्पराओं से चूंकि समाजवादी विचारधारा की ज्यादा निकटता थी इसलिए देश में समाजवादी आंदोलन को बल मिला। श्री जय प्रकाश नारायण, डा0 राममनोहर लोहिया और आचार्य नरेन्द्र देव ने इस आंदोलन की कमान सम्हाली।
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में, जिसकी अगुवाई महात्मा गांधी ने की थी, कई मूल्य एवं आदर्श स्थापित हुए थे। गांधी जी सिद्धांतहीन राजनीति को सामाजिक पाप मानते थे। उनका मानना था कि राजनीति सेवा का माध्यम है। गांधी जी साध्य साधन की पवित्रता पर बल देते थे। नैतिक मूल्यों के प्रति उनका आग्रह था। वे मानते थे कि किसी भी कार्य या योजना के केंद्र में समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को रखना चाहिए। भारत के संविधान में एक व्यक्ति एक वोट के माध्यम से व्यक्ति की गरिमा को, जाति-धर्म के भेदभाव के बिना, सम्मान दिया गया। लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मूल प्रस्तावना में शामिल किया गया।
वैसे भी आज दो तरह की विचारधाराओं में टकराव है। एक तरफ लोकतंत्र है तो दूसरी तरफ अपने को सर्वोपरि दिखने की सŸाालिप्सा। इसमें हमें तय करना है कि हमें किधर जाना है? मूल अधिकार उस समाज और व्यक्ति द्वारा प्रयोग किए जा सकते हैं जो कानून के प्रति आदर रखते हैं, जो जिम्मेदारी तथा नियंत्रण के सम्यक व्यवहार के लिए तैयार हों। लेकिन जब कोई एक समूह या दल राज्य को कैद करने को संगठित होते हैं, या इसे अपना लक्ष्य बना लेते हैं, तो किसी समाज के लिए इनका सामना करना बिना किसी अहिंसक प्रतिरोध के संभव नहीं हो सकता है। हम लोकतंत्र की परिधिमें रहकर ही संविधान के मूल उद्देश्यांे को बचा सकते हैं।
आज देश के समक्ष जो समस्यायें और चुनौतियां हैं उनके समाधान का रास्ता सिर्फ समाजवादी विचारधारा के पास ही है। जेपी-लोहिया की समाजवादी रीति-नीति पर चलने का काम राजनैतिक दल के रूप में समाजवादी पार्टी ही कर रही है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन को आगे बढ़ाने को संकल्पित है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव यह मानते हैं कि सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक लोकतंत्र के प्रमुख तंत्र हैं इसलिए वे समाजवादी व्यवस्था और समतामूलक समाज के निर्माण पर बराबर जोर देते रहते हैं। वे डा0 लोहिया के इस सिद्धांत के कायल हैं कि गैरबराबरी मिटनी चाहिए तो संभव बराबरी लक्ष्य होना चाहिए। उनकी सप्तक्रान्ति समानता, राष्ट्र और लोकतंत्र के उन्नयन की कुंजी मानी जा सकती है।
श्री अखिलेश यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में सामाजिक न्याय की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए थे। उन्होंने पिछड़ों और वंचितों के सम्मान पूर्वक जीने के लिए विशेष अवसर प्रदान करने का कार्य किया। श्री यादव मानते हैं कि सामाजिक प्रगति के साथ व्यक्ति और समाज की आर्थिक प्रगति भी होनी चाहिए तभी लोकतंत्र फल फूल सकता है।
आखिर किसानों की हितों की रक्षा का नीतियों, नेतृत्व और नियत से गहरा सम्बंध है। किसान ही भारत का प्राण है। प्राणहीन समाज में कोई जीवन नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में विचारधारा के आधार पर नीतिगत बंटवारा आवश्यक हो चला है। गंाव, कृषि और किसान की आवाज की चिंता खुद चैधरी चरण सिंह जी ने राष्ट्रीय फलक पर उठाई थी। बाद में उनके अनुयायी समाजवादी आंदोलन के साथ जुड़ गए। आज वे श्री अखिलेश यादव की अगुवाई में उसी रास्ते पर चलने का प्रयास कर रहे है। युवा पीढ़ी की चिंता भी अखिलेश जी ही करते नजर आते है। वे मानते हैं कि समाजवाद का रास्ता ही शोषण विहीन समाज का निर्माण कर सकेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत ही आर्थिक विषमता और सामाजिक गैरबराबरी मिटाने में सफल हो सकती है। लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि सभी प्रकार की सŸाा का विकेन्द्रीकरण हो। इसमें ही अगस्त क्रांति की सार्थकता निहित है।
(राजेंद्र चौधरी, उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टीके मुख्य प्रवक्ता एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री हैं।)

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

Advertise Here

Advertise Here

 

July 2026
M T W T F S S
« Sep    
 12345
6789101112
13141516171819
20212223242526
2728293031  
-->









 Type in