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Categorized | विचार

क्षमा वीरस्य भूषणम्- क्षमा वाणी पर विषेष

Posted on 29 September 2012 by admin

‘क्षमा’ जीवन का सहज सत्य
एक वास्तविकता है कि जहाॅं अन्य धर्मों के मनाते समय किसी न किसी इष्ट/ईष्वर की आराधना, धार्मिक उत्सवों में की जाती है संभवतः जैन धर्म का पर्युषण पर्व ही ऐसा दस दिवसीय धर्मोत्सव है जिसमें किसी भगवान की साधना नहीं,स्वर्ग की कामना नहीं, मानव में उत्तम मानव धर्म को जीवन में उतारने के लिये क्षमा,मार्दव,आर्जव,षौच, सत्य,संयम,तप,त्याग, आकिंचन्य,ब्रम्हचर्य, आदि आत्मा के दस लक्षणों/गुणों की साधना/आराधना की जाती है। कदाचित् इसीलिये इसे पर्व नहीं ,महापर्व कहा जाता है क्योंकि इसमें भोग नहीं लगाते, त्याग अपनाते हैं। क्षमा वाणी धर्म ,पर्युषण/ दषलक्षण पर्व, दस दिनों में दस ब्रतों की साधना के उपरान्त, समापन पर, दीर्घ काल से मनाये जाने की परमपरा है। विषेषतौर से श्रमण समाज या जैन समाज में ,क्षमापना अब एक पर्व का स्वरुप धारण कर चुका है। जैसे मुस्लिम समाज में रोजों़ के बाद ईद में परस्पर गले मिल कर मुबारकब़ाद देते हैं। या दषहरे के बाद रावण के निधन उपरान्त विजयपर्व मनाया जाता है ,या अंधेरे पर ज्योति की विजय उपरान्त दीवाली की षुभ कामनायें दी जातीं हैं।ऐसे ही दषलक्षण पर्व के समापन पर विकारों को जीत कर, परस्पर क्षमायाचना से मनोमालिन्य दूर कर यह मनाया  जाता है। कहते हैं इन दसलक्षण ब्रतों की साधनाओें के आत्म विजय से ही प्रत्येक जीवात्मा परम आत्मा बनने की ओर अग्रसर होती है। श्    दूसरे क्षमावाणी/दषलक्षण पर्व ठीक ठीक वैसे भी नहीं है कि उत्तम क्षमा कह दिया और हो गया। क्योंकि जहाॅं अन्य पर्वों में रुचिकर.पकवान ग्रहण कर मनाये जाते हैं,दषलक्षण पर्व–,उपवास/एकासन कर, पकवान के साथ कोई न कोई  व्यसन /कषाय भी, त्याग कर  मनाये जाते हैं। दरअसल क्षमावाणी, अंग्रेजी के ‘साॅरी’ या ‘एक्सक्यूज’ का अनुवाद भी नहीं है कि ‘दिल मिलें न मिलें हाथ मिलाते रहिये’-यह उत्तम क्षमा में नहीं चलता. यह अलग बात है कि स्वयं जैन समाज ने आज इस आत्म धर्म को इतना औपचारिक और बाजारु बना दिया है कि वे ही असलियत से बहुत दूर होते चले जा रहे हैं कि जिससे ‘वैज्ञानिक जन धर्म’को, उन्होंने जैनियों तक सीमित एक सम्प्रदाय बना दिया है। जन धर्म का प्रमाण यह है कि हिन्दुस्तान के हर प्रान्त के सुदूर अंचलों में प्राचीन जैन मंदिर हैं।भले वहाॅं अब जैन हों या नहीं। इतना ही नहीं पुरातत्वविद बताते हैं कि कहीं भी जमीन की खुदाई कीजिये एक न एक जैन मूर्ति अवष्य मिल जायेगी। हजारों साल पुराने जैन षास्त्र प्राचीन मंदिरों में धूल भले खा रहे हों पर प्रचुर मात्रा में षोधपरक जैन साहित्य यत्र तत्र सर्वत्र विद्यमान है जो यह दर्षाने के लिये पर्याप्त है कि विज्ञान की कसौटी पर आज भी खरा उतरने वाला जैनधर्म कभी इस देष में जन जन का धर्म अवष्य रहा होगा।वैदिक संस्कृति में वेद सबसे प्राचीन माने जाते हैं पर प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव का ़ऋग्वेद में ससम्मान उल्लेख मिलता है-देखें ऋचा /10/ 102/ 6 जो यह सि़द्ध करता है कि वेदों के पूर्व भी जैन तीर्थंकर रहे हैं।तभी न पं.जवाहर लाल नेहरु ने ‘डिस्कवरी आॅफ इण्डिया’में जैनधर्म को भारत के सबसे प्राचीन धर्माे में एक कहा है। डाॅ.राधाकष्णन ने अपनी पुस्तक ‘इण्डियन फिलास्फी’के पृष्ठ 287 पर लिखा है कि ईसा पूर्व प्रथम षताब्दी तक लोग तीर्थंकर ऋषभदेव की पूजन किया करते थे ,आदि.।कहने का आषय यह कि जैनधर्म ने ही इस महादेष में अहिंसा की नींव रखी और‘जियो और जीने दो’ का बहुमूल्य मंत्र दिया। अवतारबाद से हटकर कर्म से महान बनने का मार्ग प्रषस्त किया इत्यादि,तो दषलक्षणपर्व के बाद क्षमावाणी पर्व हम उसी गहरी पृष्ठभूमि में समझें कि क्षमावाणी मात्र षिष्टाचार नहीं अपितु आत्मा का मौलिक धर्म है जो तभी अंतस में गहराई से उतर सकता है जब किसी प्राणी ने धर्म के दष ब्रत-क्षमा,मार्दव,आर्जव, षौच,सत्य,संयम,तप, त्याग, अकिंचन,ब्रह्मचर्य का पालन किया हो, इतना ही नहीं वरन् अपनी आत्मा में इन्हें गहरे उतार लिया हो,तभी क्षमाब्रत को धारण करने की क्षमता आ सकती है,विषेषतौर से उत्तमक्षमा मनाने की। केवल रंगविरंगे कार्ड छपाकर अपना ऐष्वर्य दिखाते हुये क्षमा लिखने से नहीं, उत्सव मनाकर भी नहीं,औपचारिकता पूर्ण करने से नहीं ,मित्रों या रिष्तेदारों से क्षमा कहने से बाहरी क्षमा का प्रदर्षन भले हो जाये पर अंतरंग क्षमा का भाव तो नहीं आ सकता। इसीलिये हम देखते हैं कि क्षमा अपने दुष्मनों से माॅगने कोई नहीं जाता। उन अपनों से क्षमा माॅंगने का फिर भला क्या औचित्य जिनके प्रति कोई गल्ती कभी की ही नहीं?दरअसल यह वाणी तक सीमित रखने की चीज है भी नहीं वरन् कषाय रहित सरल हृदय की भावनाओं से ओतप्रोत एक ऐसी आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसके बाद कोई न अपराधी रहता है न दुष्मन। यह मनुष्योंश्तक भी सीमित नहीं वरन् प्राणी मात्र का धर्म है-                        खम्ममि सव्व जीवाणामं, सव्वे जीवा खमन्तु मे ।                                       मित्ती में सव्वभूएसु ,वैरं मंज्झं ण केण वि ।
अर्थात् मैं सब जीवों को क्षमा करता हॅूं और सभी जीव मुझे क्षमा करें। जगत में सभी जीवों के प्रति मेरा मैत्री भाव है और मेरा किसी से भी बैर भाव नहीं है।                    अब प्रायः कोई यह कहते नहीं देखा जाता कि मैं सभी को क्षमा करता हॅॅॅॅॅॅू। इसके कहने का आषय यह है कि अब कोई मेरा दुष्मन नहीं रहा। अगर यह गले उतर जाये तो फिर जिससे आपकी दुष्मनी है उसके घर जाकर विनयपूर्वक हाथ जोड़ कर क्षमा माॅंगने में किंचित भी संकोच नहीं रहेगा।क्या यह वीरता आप में वास्तव में है? तभी क्षमा वीरस्य भूषणम् सार्थक होगा। सच्ची वीरता पर को जीतने से नहीं अपने अन्तः को जीतने से आती है।            एक पौराणिक गाथा में मिलता है कि किसी संत ने अपने दुष्मन को उसके अपराध के लिये सौ बार क्षमा किया पर जब एक सौ एक वीं बार दुष्मन ने आक्रमण किया तो संत ने
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अपने दुष्मन का बध कर दिया। तब कथित संत ने कहा कि यदि 101वीं बार भी वह अपने दुष्मन को सह लेता तो यह उसकी कायरता होती क्योंकि क्षमा वीरस्य भूषणम्।….क्षमा तो वीर ही धारण करते हैं,कायर नहीं। क्या यह वीरता ,वीरता कही जायेगी ??….नहीं,क्योंकि यदि संत ने अंतस से क्षमा कर दिया होता तो 101वीं बार क्या, कितनी भी बार दुष्मन आक्रमण करता, संत उसे पलटकर मार ही नहीं सकता था।दरअसल क्षमा धर्म में बाहरी  दुष्मन मारने को वीरों का भूषण नही अंतरंग कषायों को मारना वीरों का भूषण कहा जाता है। क्रोध विभाव है और क्षमा आत्मा का सहज स्वभाव होता है।क्रोध का अभाव ही उत्तम क्षमा है।दषलक्षण पूजन में क्षमा/बैर के बारे में कहा गया है-
‘‘….गाली सुन मन खेद न आनौ,गुन कौ औगुन कहै बखानौ                        कहि है बखानौ वस्तु छीनें,  बाॅंध कर बहुविधि करै                              घर सें निकारै तन विदारै ,बैर जो न तहाॅं धरै ।….’’
अर्थात् आपको कोई गाली दे तो मन में खेद नहीं लाओ,तुम्हारे गुणों को वह अवगुण  बताये और तुम्हारा सर्वस्य भी छीन ले तो भी क्षमा करो। इतना ही नहीं वह तुम्हें बाॅंध कर बहुप्रकार पीड़ा भी पहुॅचाये। इससे भी आगे तुम्हारे अंग भंग करदे और उसके बाद तुम्हारे घर से भी तुम्हें निकाल दे तो भी तुम उसके प्रति क्षमा भाव बनाये रखो,मन में खेद नहीं उपजने दो तभी ‘बैर नहीं’ मानना हेागा और आप उत्तम क्षमा का धर्म धारण करने के अधिकारी होंगे।    एक और बात यह कि क्षमा धर्म व्यक्तिगत/निजी धर्म है,दो प्राणियों की सम्मिलित क्रिया नहीं।स्वाधीन क्रिया है। इसमें पर की स्वीकृति आवष्यक नहीं। अर्थात् आप कहें कि पहले सामने बाला क्षमा माॅंगे या मैं क्षमा माॅंगू तो क्या वह क्षमा कर देगा? दरअसल सामने बाला क्या करेगा वह वो जानें आपने क्षमा धर्म धारण कर लिया तो आप अपना काम करें। जमाने की चिंता नहीं। विकल्प को उत्तमक्षमा धर्म में कोई जगह नहीं है।                                  दूसरे ,व्यक्ति को क्षमावाणी पर स्वंय से भी क्षमा माॅंगना चाहिये। क्योंकि हम निरंतर अपनी आत्मा के साथ गल्तियाॅं करते हैं। आत्मा को दबा कर  कितने काम करते हैं।पीड़ा पहॅुचाते हैं इसलिये अब अपनी आत्मा के साथ अन्याय नहीं करेंगे-ऐसे समता भाव भी अपने मन में लाना चाहिये।‘अज्ञेय’ ने एक कविता में कहा है- साॅप तुम वस्ती में रहे नहीं, गाॅंवों में बसे नहीं, एक बात पूॅछूॅ इतना जहर कहाॅं से आया? मतलब आदमी में स्थित जहर यानी विकार ज्यादा घातक होता है जिसका निदान आवष्यक है जो आत्म आकलन के बाद आत्म तप से ही संभव है।                                        यह भी कि जिन गल्तियों के लिये क्षमा माॅंगी है उनकी पुनरावृत्ति नहीं होना चाहिये अन्यथा यह‘गज-स्नान’जैसा होगा कि तालाब में डूब कर नहाये और बाहर निकलकर सूॅड से सड़क पर एक फूॅक मारी और फिर धूल धूसरित।                                        इस पर्व पर प्रकृति से भी हमें क्षमा माॅंगना चाहिये जिसके प्रति हम अपने विकारों से प्रदूषण फैलाते हैं जिससे संतुलन बिगड़ रहा है।पेड़-पौधों को तोड़ना ,जैनधर्म में आदि से ही हिंसा माना गया है। वैज्ञानिक जगदीष चंद बसु ने तो बहुत बाद में वनस्पति में प्राणों की उपस्थिति बताई। जैन धर्म तो आदि से, वनस्पति में जीव की उपस्थिति मानता आ रहा है।पानी का अपव्यय नहीं करें,संचित करें। अतः सम्पूर्ण
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प्राकृतिक पर्यावरण  के प्रति मनुष्य को उत्तरदायी होना चाहिये-    दषकूपसमो वापी,कषवापिसमो हृदः।                                       दषहृदसमो पुत्रः,दषपुत्रसमो द्रुमः ।।             जैन साहित्य में अनेकों ऐसे उदाहरण हैं जब उत्तमक्षमा के जीवंत दर्षन हुये है। यथा पाष्र्वनाथ पर कमठ का उपसर्ग व धरणेन्द्र द्वारा उपसर्ग निवारण।   कभी राजा श्रेणिक ने एक तपस्यारत जैन मुनि के गले में मरा हुआ साॅंप उनको परेषान या परीक्षा के लिये डाल दिया था,उनकी रानी चेलना ने जब सुना तो दुःखी होकर मुनि सेवा में गईं और साॅंप को गले से बाहर निकाला। मुनिवर ने ध्यान स,ेजब आॅंखें खेालीं तो रानी चेलना व राजा श्रेणिक को समान भाव से आषीर्वाद दिया। मुनिवर के मन में राजा के प्रति कोई क्षोभ नहीं था।ं यह है उत्तम क्षमा।                                     आधुनिक युग में महात्मा गाॅंधी ने ऐसी ही अहिंसा और क्षमा का उदाहरण राजनीति में प्रस्तुत किया। यह केवल गाॅंधी ही कह सकते थे कि कोई तुम्हारे बाॅंयें गाल पर चाॅंटा मारे तो दाॅंया गाल भी उसके सामने कर दो। इसीलिये षायद दुनिया में एक मात्र उदाहरण है कि दक्षिण अफ्रीका ने 105 वर्ष बाद 1999 में वहाॅं की वैधानिक संस्था ने मोहनदास करम चंद गाॅंधी से अपनी तत्कालीन गल्तियों के लिये भारत से क्षमा माॅंगी थी।                                                आग कभी आग से नहीं बुझती।खून के दाग खून से साफ नहीं होते।नफरत से नहीं प्रेम से षाॅति आ सकती है।दुनिया को यदि वास्तव में रहने लायक बनाना है तो उत्तम क्षमा का धर्म ही मानवता के लिये एक मात्र विकल्प  है।

कैलाष मड़बैया, 75 चित्रगुप्त नगर,कोटरा, भोपाल 462003 ,मोबा. 09826015643

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सुरेन्द्र अग्निहोत्री
agnihotri1966@gmail.com
sa@upnewslive.com

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