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प्रसन्न रहना ही जीवन का प्रमुख लक्ष्य है

Posted on 06 July 2012 by admin

स्वास्थ्य, ज्ञान और धन मानव-जीवन के अभिन्न अंग हैं। इनमें किसी भी प्रकार के असंतुलन से जीवन में आने वाली खुशियों में उतार-चढ़ाव आ सकता है। यह विचार आज यहां राजभवन के गांधी सभागार में आयोजित ‘‘प्रकृति के माध्यम से स्वास्थ्य एवं प्रसन्नता’’ विषयक गोष्ठी में वरिष्ठ वैज्ञानिक, डा0 आनन्द अखिला ने व्यक्त किये। इस अवसर पर प्रमुख सचिव, श्री राज्यपाल, श्री जी0पटनायक तथा विशेष सचिव, श्री चन्द्र प्रकाश सहित राजभवन के समस्त अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित थे।
डा0 आनन्द अखिला ने कहा कि समाज में प्रसन्नचित रहना एक दुर्लभ वस्तु हो गयी है। अप्रसन्न तन व मन बीमारियों का घर है, थोड़ा सा बदलाव और वैज्ञानिक शैली की विचारधारा को ध्यान में रखकर कार्य करने से बहुत सी बीमारियां व मुश्किलें दूर हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि शोध द्वारा ज्ञात हुआ है कि मानव शरीर 110 से 120 वर्षों तक जीवित रहने के हिसाब से बना है, परन्तु शुरू के वर्षों में ही इससे इतनी छेड़छाड़ हो जाती है कि औसतन आयु सीमा घटकर 70-75 ही रह गयी है।
डा0 अखिला ने बताया कि हमारा शरीर अनगिनत रासयनिक पदार्थों का सम्मिश्रण है। जैसे जल प्रोटीन, वसा हीमोग्लोबिन, डी.एन.ए. फैटी ऐसिड, हारमोन आदि जो कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन, नाइट्रोजन व खनिज पांच प्रमुख रासायनिक तत्वों से बने हैं। इनमें से किसी रासायनिक पदार्थ से छेड़छाड़ होने पर शरीर में असंतुलन व बीमारियां घर करती हैं। इसलिये दवाइयों का प्रयोग बहुत सोच समझकर करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आसानी से उपलब्ध तुलसी, हल्दी, दालचीनी, ब्रहमी, मीठी नीम, अश्वगंधा आदि का नियमित सेवन किया जाना चाहिए। इन पौधों में पाए जाने वाले रासायनिक पदार्थ शरीर की जीवाणुओं के विरूद्ध प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि शरीर में खनिजों का विशेष महत्व है। इसलिये अंजीर, अखरोट, खजूर आदि का भी नियमित सेवन करना चाहिये।
डा0 अखिला ने बताया कि सकरात्मक सोच, दूसरों की मदद करने की प्रवृत्ति, संतुलित आहार, हल्का व्यायाम, अपने काम खुद करना, गुस्से व तनाव से दूर रहना, अच्छे लोगों की संगत करने से तन-मन दोनों ही प्रसन्न व स्वस्थ रहते हैं।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
agnihotri1966@gmail.com
sa@upnewslive.com

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