Categorized | मनोरंजन

‘शूद्र’ 25 करोड़ लोगों की कहानी : संजीव जायसवाल

Posted on 27 February 2012 by admin

ज्वलंत और मन को झकझोर देने वाली फिल्म ‘शूद्र द राइजिंग’ जल्द ही रिलीज होने वाली है। ‘शूद्र’ को सेंसर बोर्ड से अभी प्रमाणपत्र नहीं मिला है, लेकिन विषय की गंभीरता, संवेदनशीलता और तेवरों को देखते हुए लगता है कि रिलीज के साथ ही फिल्म विवादों में घिर सकती है।

‘शूद्र’ को पिछले दिनों गोवा में हुए अंर्तराष्ट्रीय फिल्म समारोह में काफी सराहना मिली थी। नए कलाकारों की इस फिल्म को युवा फिल्मकार संजीव जायसवाल ने बनाया है। संजीव फिल्म के निर्माता, निर्देशक और लेखक तीनों ही हैं। पेश हैं संजीव से हुई बातचीत के कुछ अंश -

‘शूद्र’ पर फिल्म बनाने का विचार कैसे आया?

जब कुछ बुजुर्गों ने मुझे बताया कि शूद्रों के पैरो में घंटिया बांध दी जाती थी, कमर में झाडू लटकाया जाता था तो मैं उद्वेलित हो गया। मुझे लगा कि इस गंभीर विषय पर फिल्म बनानी चाहिए। फिर इस बारे में इंटरनेट पर खोजबीन की, किताबों के पन्ने पलटे और समस्या की गहराई जानने और असलियत समझने की कोशिश की और लगा कि वर्षों से फैली हिंसा की जड़ में जाति व्यवस्था ही है।

शूद्रों के प्रति वर्तमान स्थिति ?

आज भी हरियाणा में दलित के हाथ काटे जाते हैं। उड़ीसा में अभी हाल में घरों को जलाया जाता है। देश में दलितों पर होने वाले अत्याचार, अपराध और प्रताड़ना की घटनाओं में उतरोत्तर वृद्धि हो रही है। अभी भी दलितों को धर्मस्थलों में आने से रोका जाता है। केवल कहने भर से कि हम सब एक हैं। कोई परिर्वतन नहीं आने वाला। अपनी जाति को श्रेष्ठ साबित करने के लिए हिंसा और आंतकवाद का सहारा लेकर दूसरी जाति को नीचा दिखाने का षडयंत्र मात्र है, यदि हम अब भी नहीं जागे तो न मानव बचेगा न धर्म। समानता की भावना ही शांति का मूल मंत्र है।

विवाद का शिकार हो सकती है ‘शूद्र’?

हां, हो सकता है। लेकिन हमने जो दिखाया है वो तथ्यों पर आधारित है। असल समस्या सिस्टम की है, अपने फायदे के लिए चंद लोग पूरे समाज को भरमाने और भटकाने का काम करते हैं। ऐसे में गंभीर प्रयास भी विवादों का शिकार हो जाते हैं। हमने समाज की बात की है, ये कोई काल्पनिक कथा नहीं है। जो हुआ है उसे पर्दे पर पूरी ईमानदारी से उतारने का प्रयास किया है। कुछ लोगों को इससे तकलीफ हो सकती है, लेकिन समाज को आईना दिखाएगी ‘शूद्र’।

गोवा में हुए अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में गोविंद निहलानी, शेखर कपूर और विशाल भारद्वाज जैसे फिल्मकारों ने मेरे प्रयास को सराहा है। इस फिल्म के माध्यम से हम सन्देश देना चाहते हैं कि वे पुरानी रूढ़ीवादी मान्यताओं को त्याग कर आज के बदलते दौर के साथ कदम से कदम मिलाकर चलें।

फिल्म ‘शूद्र’ की खासियत ?

ये सच है कि समाज की इस कड़वी और तल्ख हकीकत को पहले भी बड़े पर्दे पर फिल्माया जा चुका है, लेकिन मेरी फिल्म पूरी तरह से जातिप्रथा के खिलाफ है। मैंने इसकी तह में जाने की कोशिश की है। इसीलिए अतीत में जाकर इसकी वजह तलाशी है। कैसे हिंदुओं ने खुद को ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों में बांट रखा है। कैसे समाज में जहर फैला जिसकी वजह से सदियों तक दलितों को अछूत बनाए रखा। मैं एक क्रिएटिव आदमी हूं, इसलिए सिनेमा के माध्यम से खामोश क्रांति लाना चाहता हूं।

नए कलाकारों को लेने की वजह ?

मैं अपनी कहानी में कोई समझौता नहीं करना चाहता था, इसलिये मैंने में नए कलाकारों को लिया है, अगर कोई बड़ा अभिनेता लेता तो फिल्म अपने मुद्दे से भटक जाती।

नए कलाकारों ने चरित्र और कहानी के साथ पूरा न्याय किया है। जो मैसेज मैं फिल्म के जरिये देना चाहता था लगता है, उसमें सफल रहा हूं।

फिल्म के बारे में बताइये?

‘शूद्र’ 25 करोड़ लोगों की कहानी है। फिल्म मनु स्मृति से शुरू होकर आज के समय तक आती है और दलितों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित किये जाने की समस्या को उठाती है।
इसकी कहानी बाला, माधव और भेरु की है, जिन्होंने अमानवीय परिस्थितियों के खिलाफ मोर्चा खोला। यह कहानी उस संघर्ष की भी है जिस कारण शूद्र कहलाने वाले पिछले तबके के लोग भोजन, पानी, दवाई, आत्म-सम्मान और आजादी के लिए मर रहे हैं। किसी शूद्र को सिर्फ इसलिए मर दिया जाता है कि उसने किसी खास कुएं से एक बूंद पानी पी लिया। घाव से पीडि़त आदमी दवा का मोहताज होकर मरता है, तो वहीं किसी बच्चे को सिर्फ इसलिए प्रताड़ना झेलनी पड़ती है कि उसके कानों में कुछ वेद-मंत्र चले गए हैं।

‘शूद्र’ किसी राजनीतिक फायदे के लिए तो नहीं?

अगर ऐसा होता तो हम इसे चुनाव से पहले रिलीज करने की कोशिश करते। ‘शूद्र’ का सब्जेक्ट बहुत बड़ा है। किसी छोटे लाभ या सस्ती लोकप्रियता के लिए इसे बर्बाद नहीं किया जा सकता। यह एक बड़ा और गंभीर मुद्दा है। हम इसे किसी दल या प्रदेश तक बाँधने की बजाय विश्व स्तर पर ले जाना चाहते हैं इसलिए फिल्म में शिवाजी, डॉ. अम्बेडकर के साथ ही नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग जैसे नेताओं की चर्चा की है। यह फिल्म बाबा साहेब डा. अंबेडकर को समर्पित है। फिल्म पर किसी दल को लाभ पहुंचाने से न जोड़ दिया जाए, इसलिए यूपी में विधानसभा चुनावों के बाद ही इसे प्रदर्शित करने की तैयारी है। वहीं अभी फिल्म को सेंसर बोर्ड से प्रमाण पत्र भी नहीं मिला है। सबकुछ ठीक रहा तो बाबा साहब के जन्मदिन से एक दिन पूर्व 13 अप्रैल को फिल्म रिलीज करने की योजना है।

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

Advertise Here

Advertise Here

 

June 2026
M T W T F S S
« Sep    
1234567
891011121314
15161718192021
22232425262728
2930  
-->









 Type in