सरकार से तत्काल जनलोकपाल पारित करने की मांग

Posted on 25 August 2011 by admin

भ्रष्टाचार के विरुद्ध राष्ट्रीय अभियान (नेशनल कम्पेन अगेंस्ट करप्शन) के राष्ट्रीय समन्वयक श्री राम शास्त्री और अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने केन्द्र सरकार पर जानबूझकर जन लोकपाल बिल को पारित करने में आनाकानी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार को अन्ना हजारे से बातचीत करके तुरन्त जनलोकपाल बिल को पारित करना चाहिए। ये दोनों आज यहां काॅफी हाउस में आयोजित संयुक्त संवाददाता सम्मलेन में पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे।
श्री शास्त्री ने बताया कि जन लोकपाल बिल पर राष्ट्रीय सहमति 1962 में ही बन गई थी जब देश के प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू की मौजूदगी में सभी राज्यों के विधि मंत्रियों, केन्द्रीय विधि मंत्री, राज्यों के एडवोकेट जनरल, केन्द्रीय विधि सचिव  समेत 1500 से अधिक विधि वेत्ताओं ने 12 अगस्त 1962 को आयोजित दिल्ली के एक सम्मेलन में एक सशक्त लोकपाल बनाने का प्रस्ताव पारित किया था। उसके कुछ दिनों के बाद ही भारत चीन का युद्ध प्रारंभ हो गया जिससे लोकपाल का मामला ठण्डे बस्ते में चला गया और सरकार अब किसी कीमत पर इसे जीवित नहीं होने देना चाहती है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री जीवीजी कृष्णमूर्ति के संरक्षण में चल रहे भ्रष्टाचार के विरुद्ध राष्ट्रीय अभियान का मानना है कि अगर सरकार ने स्वयं ही उक्त प्रस्ताव के आलोक में सशक्त जन लोकपाल बिल पारित कर दिया होता तो आज अन्ना हजारे को आंदोलन करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
श्री राम शास्त्री ने बताया कि 1962 में पारित लोकपाल के प्रस्ताव में कहा गया था कि लोकपाल को समाचार अथवा स्वयं भ्रष्टाचार पर कार्यवाई करने का अधिकार होगा। वह कार्यपालिका एवं विधायिका के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकेगा। वह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समकक्ष होगा। उसे विधायिका एवं कार्यपालिका से सूचनाएं प्राप्त करने का अधिकार होगा। राज्य के लोकायुक्तों के निर्णयों पर उसका निर्णय अंतिम होगा। वह अपनी रपट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करेगा और उसके क्रियाकलापों पर संसद में चर्चा नहीं हो सकेगी। वह नागरिक अधिकारों के प्रभावित होने की दशा में सरकार से जानकारी एवं सहयोग प्राप्त कर सकता है।
श्री राम शास्त्री एवं विश्वनाथ चतुर्वेदी ने कहा कि जब कांग्रेस और भाजपा दोनों ही सरकारें चुनाव के पहले भ्रष्टाचार को समाप्त करने का नारा देती हैं तो अब उन्हें जनलोकपाल पर आपत्ति क्यों है। उन्होंने कहा कि यह देश के लिए आपातकाल जैसी स्थिति है। जैसे युद्ध के दौरान तुरत निर्णय लेकर कार्यवाई की जाती है उसी तरह से जनलोकपाल को पारित करने के लिए भी तुरत निर्णय लेकर कार्यवाही की जाए।
दोनों  वक्ताओं ने कहा कि तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त श्री जीवीजी कृष्णमूर्ति ने 1996 में एक सर्वेक्षण कराया था जिसमें पता चला था कि 543 संसद सदस्यों में से 62 आपराधिक पृष्ठभूमि के  थे वर्ष 2009 में यह संख्या घटने के बजाए बढ़ गई और 543 में से 156 आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग संसद पहुंच गए। राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को मंत्री पद से नवाजने में भी शर्म नहीं महसूस करते हैं। आज विधानसभाओं में एक तिहाई आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग पहंुच गए हैं, जोकि लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। आज भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले आरटीआई कार्यकर्ताओं की देशभर में हत्याएं हो रहीं हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत कदम उठाने के लिए जन लोकपाल ही एकमात्र रास्ता है। आज से 2300 वर्ष पहले कौटिल्य के काल में राजा से ऊपर जब दण्डाधिकारी की नियुक्ति की जा सकती है तो आज लोकतांत्रिक व्यवस्था में जन लोकपाल क्यों नहीं बनाया जा सकता। सरकार को चाहिए कि हठधर्मिता छोड़कर तत्काल जनलोकपाल बिल पारित करे और अन्ना हजारे की मांग को मानकर जनभावनाओं को सम्मान करे।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
मो0 9415508695
upnewslive.com

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