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कृषि के प्रति उदासीन नीति के कारण कृषि के सामने खड़ी होती चुनौती

Posted on 14 April 2011 by admin

भारतीय किसानों के संघ द्वारा कृषि भूमि और कृषि के प्रति अन्र्राष्ट्रीय षंडयन्त्रों को जनता के बीच ले जाने के उद्देश्य से राजधानी लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में संघ प्रतिनिधि एम.जे. खान देहात मोर्चा के केसरी सिंह गुज्जर, राष्ट्रीय किसान संगठन के प्रीति सिंह ने एक संयुक्त प्रेस वार्ता में केन्द्र सरकार की कृषि के प्रति उदासीन नीति के कारण कृषि के सामने खड़ी होती चुनौती पर प्रकाश डाला। देहात मोर्चा के संयोजक केसरी सिंह गुज्जर ने बताया कि डा0 स्वामी नाथन कमीशन की रिपोर्ट कृषि में तुरन्त लागू की जाये। कृषि भूमि अधिग्रहण इसी रफ्तार मे होती रही तो लाखांे लोग भूखों मरने के लिए मजबूर हो जायेगे। अंग्रेजों द्वारा भूमि अधिग्रहण सिर्फ सड़क, बंाध तथा सरकारी कार्यो के लिये होता रहा लेकिन भारतीय सरकार गोरे अंग्रेजों से भी बदत्तर साबित हो रही है। तथा कथित काले अंग्रेजों ने धारा 4 तथा 17 जोड़कर उद्योग पतियों के लिये बिचैलिया के लिये भूमिका अदाकर दी है।  सरकार प्रोपर्टी डीलर बन गयी है। तो कहीं सरकार दलाल बन गयी है। देश और प्रदेश में जितने प्राधिकरण है सब दलाली के अड्डे है नेता और अधिकारी कमाते है और जिस जमीन को अधिग्रहण कर रहे है उसी जमीन का मालिक अपने ही नौकरों से मिलने नौकरों के नौकर से पास लेने को मजबूर है। क्या यह आजादी इसी लिये ली गयी थी। 35 लाख हेक्टेयर जमीन कृषि की खत्म कर दी गयी । जमीन को लेकर भट्टा मंे पिछले तीन माह से आन्दोलन चल रहा है। एनसीआर में आगरा तक चार टाउनशिप बनाने के लिये जेपी को ठेका दे दिया गया है। इस ठेके की आड़ में किनका भला हो रहा है और किसान कंगाल हो रहा है। किसानों के कंगाल होने के साथ साथ आम आदमी पर भी असर पड़ेगा। हमारी देश की फ्रूड सिक्योरिटी खत्म हो जायेगी। आज एक लाख से अधिक परिवार नोएडा में कृषि भूमि अधिग्रहण के बाद सड़कों पर आ गये है। जो भुखमरी के कारण अपराध करने को पीछे नही हटते है। पुर्नावास नीति न होने के कारण किसान जो अन्नदाता था वह अपराधी बनने को मजबूर है। देश में 40 प्रतिशत यूथ कृषि कार्य छोड़ना चाहता है। क्योंकि देश मंे ग्लोबल गेम चल रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित साधने के लिये अपने ही लोग देश द्रोही बन गयी है। वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिये सीड बिल लाने के लिये लाबिंग कर रहे है। ताकि किसान बीज स्वयं न तैयार कर सके। और बहुराष्ट्रीय कंपनियां के पेंटेन्ट बीज का उपयोग करें। इस बीज की उपयोगिता से हमारे आम आदमियों पर ही असर पड़ेगा। हमारी स्वतंत्रा को प्रतन्त्र के लिये पिछले दरवाजे से दस्तख दी जा रही है। इसी तरह इन्डोसल्फान को बैन करने के लिये लाबिंग चल रही है। हाल ही में झकझोर देने वाली बात पता चली हैं कि विदेशी संगठन देश में किसानों के हितों के विपरीत एनजीओ को फंड मुहैया कर रहे है। हाल ही में आरटीआई के माध्यम से पता चला है कि यूरोपियन यूनियन ने दिल्ली स्थित पर्यावरणीय एनजीओ सेंटर फाॅर साइंस ऐंड इन्वायरमेंट (सीएसई) को 56 करोड़ रूपये दिए है। यह लोकप्रिय कीटनाशक इंडोसल्फेन के खिलाफ दबाव बनाने वाले समूह को बनाने के लिए दिया गया है। भारत में 75 मिलियन किसान र्है, जो इस उत्पाद का इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि यह उत्पाद बहुत ही प्रभावशाली है और लागत मंे कम है तथा उनकी फसलों की सुरक्षा के लिए जरूरी है। आईपीएम में वैज्ञानिकों द्वारा इंडोसल्फेन की सिफारिश पहले उत्पाद के बतौर की गई है,क्योंकि यह उत्पाद बहुत ही प्रभावशाली है और लागत मंे कम है तथा उनकी फसलांे की सुरक्षा के लिए जरूरी है। आईपीएम में वैज्ञानिकों द्वारा इंडोसल्फेन की सिफारिश पहले उत्पाद के बतौर की गई है, कयोंकि यह स्तनधारी के लिए कम विषैला है और उनके लिए मित्रवत हो रहा है। तथापि कुछ विदेशी वित्तपोषित एनजीओ पर्यावरण की आड में छुपी भूमिका निभा रहे है और इस पर प्रतिबंध लगाना चाहते है और इस तरह से भारत के खाद्य उत्पादन को खतरा पैदा कर रहे है। आश्चर्य होता है इन संगठनांे का हित अपने देश की सेवा करने में है?

किसान संगठनों की यह भी मांग है कि 5000 करोड़ रूपये की आय बीमा स्कीम को लांच किया जाए ताकि किसानों को मूल्य में उतार चढ़ाव और फसल नहीं होने की स्थिति में कवर मिल सके। हमारी मांग हमारे उत्पाद की उचित मूल्य मिलने की है, न कि कोई सब्सिडी, जो किसानों के लिए हानिकारक है। अधिकतम समर्थन मूल्य का विस्तार और फसलों तक किया जाए विशेषकर बागवानी की फसलों को। किसानों ने 2011-12 के बजट को निराशाजनक बताया है क्योंकि कृषि विकास के लिए कोई प्रमुख कार्यक्रम नहीं लांच किया गया है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि किसी किसान संगठन को बजट पूर्व या बजट बाद चर्चा मंे नही बुलाया गया सिर्फ कुछ एमएनसी प्रायोजित किसानों को बुलाया गया था। भूमि अधिग्रहण मुद्दे पर किसानों ने चेताया कि सरकार को प्रापर्टी डीलर के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए और किसानांे को न्यूनतम 75 प्रतिशत बाजार दर मिलनी चाहिए। यदि भूमि अधिग्रहण बिल किसानों को संतुष्ट करने जैसा नही पास किया जाता है, तब वे इसका राष्ट्रव्यापी विरोध करेंगे। फिफो को भारत के प्रमुख किसान संगठनों द्वारा प्रमोट किया गया है, जिसमें भारतीय कृषक समाज, कन्फेडरेशन आॅफ किसान आर्गेनाइजेशन, राष्ट्रीय किसान संगठन, गुजरात फार्मर्स फेडरेशन, आल इंडिया वेजीटेबल ग्रोवर्स ऐसोसिएशन, भारतीय किसान यूनियन, आॅल अंडिया एप्पल ग्रोवर्स एसोसिएशन, बिहार फार्मर्स फेडरेशन, एसोसिएशन आॅफ हरियाणा फार्मर्स क्लब, किसान मेल सेल बीजेपी, आॅल इंडिया मेडिसिनल प्लांट्स एसोसिएशन, यूपी सीड ग्रोवर्स एसोसिएशन, केरल आर्गेनिक मूवमेंट के अलावा अन्य का समावेश है।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
मो0 9415508695
upnewslive.com

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