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श्रीरामकथा ज्ञान यज्ञ महोत्सव

Posted on 13 April 2011 by admin

dsc_0068लक्ष्मणपुरी सेवा संस्थान के तत्वावधान में पूज्य संत प्रवर विजय कौशल जी महाराज ने श्रीरामकथा ज्ञान यज्ञ महोत्सव के अन्तर्गत आज रामलीला ग्राउण्ड में कथा के तीसरे दिन हनुमान चालीसा के महत्व व अर्थ को विस्तार से बताया।

संत विजय कौशल जी कहते हैं कि हनुमान जी भगवान के कार्य के लिए किसी भी प्रकार के मान-सम्मान से दूर रहते हैं। रावण हनुमान जी की पूंूछ से बहुत जलता था। क्योंकि वह अंहकारी था। विजय कौशल जी मूंछ व पूंछ के महत्व को बताते हुए कहते हैं कि मूंछ अंहकार व पूंछ सज्जनता का प्रतीक है। सारा झगड़ा मूंछ का है। जो अपनी मूंछ के लिए लड़ते हैं, उन्हें कोई नहीं पूछता। दुष्टï सदैव पूछ को जलाने की कोशिश करते हैं। सज्ज्नों की प्रतिष्ठïा को जलाने के लिए दुष्टï एक हो जाते हैं। हर युग में दुष्टïों ने सज्जनों की प्रतिष्ठïा को नष्टï करने का प्रयास किया है। लेकिन जब दुष्टï सज्जनों की प्रतिष्ठïा को जलाने की चेष्ठïा करते है तो सज्जनों की प्रतिष्ठïा और बढ़ जाती है।

संतश्री विजय कौशल जी कहते हैं कि जो भी भगवत कार्य करेगा उसकी प्रतिष्ठïा और बढ़ेगी। उनहोंने प्रहलाद व होलिका के प्रसंग को सुनाते हुए कहा कि हिरण्यकश्यप होलिका के पास प्रहलाद को भस्म करने की अनुनय करने गया क्योंकि होलिका को ब्रम्हा जी का वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी तो वह तो भस्म हो गयी मगर प्रहलाद सकुशल बच गये। इस पर हिरण्यकश्यप ब्रम्हा जी के पास पहुंचा और उनसे कहा कि होलिका को को वरदान प्राप्त था फिर भी क्यों जल गयी। इस पर  ब्रम्हा जी ने कहा कि होलिका भगवान के रोष की अग्नि में जल गयी। जो अपराध भगत पर करही, राम रोष पावक सो जरहिं। कहने का तात्पर्य है कि भगवान अपने भक्त की हर परिस्थिति में रक्षा करते हैं। संतश्री कहते हैं कि जो अपने अहंकार के लिए रोता है उसे कभी सम्मन नहीं मिला है। आप जिसके पीछे दौड़ते हैं, वह आपसे और दूर हो जाता है। हनुमान जी ज्ञान, गुण के सागर हैं। श्री हनुमान जी के गुण हमारे पास भगवान को लेूकर आये हैं। प्रहलाद से सम्बन्धित एक प्रसंग को सुनाते हुए विजय कौशल जी कहते हैं कि एक बार इन्द्र बा्रम्हण का भेष बनाकर प्रहलाद के पास जाते हैं तो प्रहलाद उन्हें पहचान लेते हैं मगर कुछ कहते नहीं। प्रहलाद जी के स्वागत करने व उनके अपने का कारण पूछने पर ब्राम्हण भेष बने इन्द्र उनसे सब कुछ मांग लेते हैं मगर जैसे ही प्रहलाद से उनका शील मांगते है तो प्रहलाद कहते है कि मैै अपना शील आपको नहीं दे सकता, इसका कारण पूछने पर प्रहलाद कहते है कि मैंने अपने शील से ही आप इन्द्र हैं, यह पहचान लिया। अगर मैैं अपना शील ही आपको दे दूँगा तो मेरे पास क्या बचेगा। यह न तुम्हारे हित में है और हमारे हित में है।

श्री विजय कौशल जी कहते है कि हनुमान जी के पास शील है। जो अकड़ू होता है उसके पास कुछ नहीं रहता।  जिस प्रकार नदियां चलकर सागर में मिल जाती हैं, उसी प्रकार जीवन में एक सदगुण आने पर समस्त दुर्गुण स्वयं समाप्त हो जाते हैं। क्योंकि सागर में भी शील है। वे कहते हैं कि एक बार साधु के पास जाना शुरू करिये आपके समस्त अवगुण चले जायेंगे।। वे कहते हैं कि जिस व्यक्ति के पास सदगुण चले जाते हैं, वह दुष्टï से भी सज्जन बन जाता है। जिसके पास एक बार दुर्गुण आ जाये तो उसके पास एक के बाद एक दुर्गुण आते चलें जाते हैं। सज्जन का मतलब बताते हुए विजय कौशल जी कहते हैं कि राम-राम तेहिं सुमिरन कीन्हा, हृदय हरषि कपि सज्जन चीन्हा। ऐसा विभीषन ने जब हनुमान उनके द्वार पर जाते है तो कहा था जिससे हनुमान जी समझ गये कि यह व्यक्ति राम को जानता है इसलिए सज्जन है। सज्जन की यही परिभाषा है। वे कहते हंैं कि जो व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों में भी भजन,पूजन व पाठ कर ले वह सज्जन है। संतश्री ने समुद्र को सज्जन बताते हुए कहा कि समुद्र  पूर्णमासी को चन्द्रमा के पूरा निकलने पर अथाह हो जाता है उसकी लहरें ऊँचाइयों को छूने लगती हैं। वह उल्लास से भर जाता है। दूसरों के दुख में तो सभी दुखी होते है जो दूसरों के सुखों में आनन्दित हो , वही सज्जन है।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
मो0 9415508695
upnewslive.com

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