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Categorized | समाज

बुंदेलखंड में भी किराये की कोख की दस्तक

Posted on 07 September 2010 by admin

आधुनिक जीवनशैली, महंगे शौक, धन और सैर-सपाटे की चाह में भारत के लड़के शुक्राणु और लड़कियां अंडाणु बेचने में जरा भी हिचक नहीं रहे हैं। कुछ लड़कियां तो ऐसी भी हैं, जो पैसे के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

हमारे देश में पहले बिन व्याही मां बनना समाज के लिए कलंक की बात थी, आज भी है, लेकिन अब चंद रुपयों की खातिर लड़कियां घर से महीनों दूर रहकर कोख किराए पर देने जैसा जोखिम भरा काम कर रही हैं। विज्ञान में इन्हें ‘सरोगेट मदर’ कहा जाता है। एक इस काम के लिए इश्तहार देता है और दूसरा तत्काल तैयार हो जाता है। सुनने में यह बात अविश्वनीय लगे, लेकिन मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से लेकर दिल्ली तक यह व्यवसाय धड़ल्ले से चल निकला है। टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर की सुख-सुविधाएं भी कुवांरियों को मां बनने के लिए आकर्षित कर रही हैं। सरोगेसी के मामले में मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल के साथ- साथ बुंदेलखंड में भी  मेट्रो सिटी की तरह बढ़ रही है। आलम यह है कि यहां यूपी, बिहार, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश तक से दंपत्ति सरोगेट मदर की तलाश में आ रहे हैं।

चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें अविवाहित लड़कियों की भी बड़ी संख्या सामने आ रही है, जो पैसों की खातिर बिन व्याही मां बनने को भी तैयार हैं। अपना पूरा भविष्य दांव पर लगाने तैयार कुछ ऐसी ही कुछ लड़कियों से जब सेंटर स्टाफर बनकर बातचीत की गई, तो उन्‍होंने कई बातें बड़ी बेबाकी से सामने रखीं। उनका सीधा कहना है कि भविष्य की कोई गारंटी नहीं है। आज हमें कुछ महीनों में ही दो लाख रुपए तक मिल रहे हैं, वो भी बगैर कोई गलत कदम उठाए, तो फिर इसमें हर्ज क्या है? राजधानी में बीई की पढ़ाई कर रही इंदौर की अनुष्का  (परिवर्तित नाम) कहती है, ‘पापाजी की डेथ हो चुकी है। मां भी मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं। दो भाई हैं, जिन्हें मुझसे कोई सरोकार नहीं है। पढ़ाई के लिए तो पापा ने भेजा था। हमने एजुकेशन लोन लिया था। पापा मेरे नाम कुछ फिक्स डिवाजिट भी किए थे। दो साल पहले पापा की डेथ हो गई, तब से मैं सारे फैसले खुद ही ले रही हूं। अपने भविष्य को लेकर ही मैं फ्लैट लेना चाहती हूं। लिहाजा सरोगेट मदर बनकर फ्लैट के लिए रुपए जुटाने का फैसला किया है।’

बैतूल की अनीता  (परिवर्तित नाम) भोपल में रिसेप्शनिस्ट है। वह चाहती है कि उसकी खुद की कार हो, लेकिन परिवारिक परिस्थितियां और सेलरी से यह सपना पूरा नहीं हो सकता। तान्या ने कार लेने के लिए अब सरोगेट मदर बनने का रास्ता चुना है। बुंदेलखंड  की विभा (परिवर्तित नाम) की बचपन में ही शादी हो गई। गौने से 3 महीने पहले ही पति ने दूसरी शादी कर ली। अब वह आत्मनिर्भर होना चाहती है, लेकिन इसमें गरीबी आड़े आ रही है। विभा ने इसके लिए सरोगेट मदर बनने का रास्ता चुना।

भूमि (परिवर्तित नाम) के माता-पिता की मृत्यु हो गई। अब वह  एक ऑफिस में रिसेप्‍शनिस्ट है। उसे प्यार में धोखा मिला, अब भूमि ने आत्मनिर्भर होने के लिए सरोगेट मदर बनने का निर्णय लिया है। जब उससे यह पूछा गया कि क्या उसे ऐसा करने में समाज से डर नहीं लगता है, तो उसने कहा, ‘जब मुझे भूख लगती है, तो कोई पुछने नहीं आता, ऐसे में डरे किससे? क्या उस समाज से डरूं, जो मेरी मदद नहीं कर सकता।’

हालांकि, तलाक डर से इन दिनों कई लड़कियां सर्जरी की मदद से कौमार्य हासिल कर रही हैं। यहां तक कि कुछ तो डॉक्टर से वर्जिनिटी सर्टिफिकेट भी मांगती हैं। शादी के वक्त लड़की का गोरा रंग, दुबला शरीर और ऊंचा कद तो मायने रखता ही है, पर हमारे समाज में सबसे ज्यादा जरूरी है उसका अनछुई होना। शादी की रात ही यह जान कर कि दुलहन वर्जिन नहीं है, अपनी पत्नी को तलाक दे देना कोई नई बात नहीं है या यह जानने के बाद कि पत्नी का कभी किसी और से भी संबंध रहा है, उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडि़त करना भी कोई नई बात नहीं है। अपने सपनों में अनगिनत लड़कियों को नोचता हुआ, चीरता हुआ यह शरीफ मर्द आंचल में ढंकी बीवी की ख्वाहिश करता है। शादी से पहले किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाया, तो आप बदचलन हैं। आपका करैक्टर आपकी वर्जिनिटी पर आधारित है। हमारे देश में औरत की वर्जिनिटी को उसकी इज्जत कहा जाता है। शायद, इसीलिए कोई वहशी किसी लड़की से बलात्कार करता है, तो वह आत्महत्या कर लेती है। अगर लड़की ऐसा न भी चाहे, तो समाज उसके साथ इतनी हिकारत से पेश आता है कि उसके सामने कोई चारा नहीं होता।

कुछ लड़कियों से जब यह पूछा कि अगर बिन व्याही मां बनने की बात समाज के सामने आ जाती है, तो फिर आपके भविष्य का क्या होगा। इसके जवाब में सभी का एक जैसा नजरिया था कि फैसला उनका अपना है, इसलिए वे भविष्य की हर परेशानी के लिए भी पूरी तरह से तैयार हैं।

टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर के एक संचालक कहते हैं कि कोख किराए पर देने वाली महिलाओं का आंकड़ा बढऩे के पीछे वजह, इनके लिए उपलब्ध मार्केट है। वहीं उच्चवर्ग की महिलाएं अपने फिगर को मेंटेन रखने, गर्भपात होने से पैदा होने वाली परेशानियों से बचने के लिए सरोगेट मदर की मदद लेना ज्यादा बेहतर समझती हैं। ये महिलाएं झूठी स्‍वास्‍थ्‍य परेशानियों का बहाना बनाकर सरोगेट मदर्स का सहारा लेने की भरसक कोशिश करती हैं। वे कहते हैं, ‘गर्भधारण का अनुभव प्रमाण सहित होना जरूरी है। इसके लिए विवाहित होने की बाध्यता नहीं है। अविवाहित लड़िकयां भी गर्भधारण का अनुभव होने पर सरोगेट मदर बन सकती हैं। विवाहिता के पति की अनुमति जरूरी है। अविवाहिता और तलाकशुदा के लिए केवल उसकी अपनी मर्जी ही काफी है, जबकि तलाक के लंबित मामलों में महिला कोख किराए पर नहीं दे सकती। महिला को ऐसी कोई बीमारी न हो, जिसके बच्चे में स्थानांतरित होने की आशंका हो और उसकी उम्र 21 से 45 साल के बीच हो।’

यह तो रही कोख किराए पर देने वालों की दास्तान। यही कुछ हाल है शुक्राणु और अंडाणु बेचने वालों का। बताया जाता है कि बेहतर गुणवत्ता वाले शुक्राणु और अंडाणुओं की विदेशों में अच्छी-खासी कीमत मिल रही है। नीली आंखों वाली लड़कियों के अंडाणुओं की कीमत सबसे अधिक है। वहीं उच्च वर्ण, गोरा रंग और लंबाई वाले लड़कों के शुक्राणुओं का बाजार तेजी पकड़ रहा है। वैसे देश के महानगरों में भी इसका चलन जोर पकड़ रहा है, लेकिन फर्टीलिटी टूरिज्म के जरिए विदेशों में नि:शुल्क घूमने-फिरने और रहने का बोनस पैकेज युवाओं को ज्यादा लुभा रहा है।

दिल्ली-एनसीआर के कई प्रजनन केंद्रों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनके यहां दिल्ली विश्वविद्यालय की कई लड़कियां अपने अंडे का दान करने आती हैं और बदले में उनको अच्छी रकम भी मिल जाती है। ब्रिटेन जैसे देशों में भारतीय युवाओं को शुक्राणु और अंडाणु देने के एवज में 30 हजार डॉलर तक मिल रहे हैं। वैसे ब्रिटेन में शुक्राणु और अंडाणु दान करने वाले लोगों को अब 800 पौंड देने का प्रावधान किया गया है, लेकिन ब्रिटिश दंपतियों में भारतीय नस्ल के बढ़ते क्रेज को देखते हुए इसकी कीमत इससे कहीं ज्यादा है। ह्युमन फर्टीलिटी एंड एम्ब्रियोलॉजी ऑथरिटी (ब्रिटेन) ने वीर्य दान करने वालों को अब ज्यादा भुगतान करने का प्रावधान किया है। इसके मुताबिक अब वीर्य दाताओं को 800 पौंड (लगभग एक लाख रुपए) मिलेंगे। पहले इसके एवज में वहां महज 250 पौंड का भुगतान किया जाता था।

ब्रिटेन जैसे देशों में महिलाओं में बांझपन व पुरुषों में नपुंसकता दर ज्यादा होने की वजह से उनके अंडाणु और शुक्राणु इनविट्रो फर्टीलिटी तकनीक (आईबीएफ) के लिए उपयुक्त नहीं रहे हैं। चूंकि भारत एक सम-शीतोष्ण देश है, इसलिए यहां के युवा प्रजनन के लिए अधिक उपयुक्त माने जाते हैं। लेडी हार्डिंग अस्पताल में स्त्री एवं प्रसूति विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सीमा सिंघल का कहना है, ‘विज्ञान के विकास ने मां-बाप बनने की संभावनाओं को बढ़ाया है। इसकी वजह से लोग किसी भी कीमत पर अपनी सूनी गोद को हरी करना चाहते हैं। इसके एवज में वे कोई भी कीमत चुकाने को तैयार होते हैं, और लाभ उठाने वाले इसका लाभ उठाते हैं। इसके लिए आचार संहिता चाहिए, जो अभी नहीं है।’


Vikas Sharma
Editor
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