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पीठों व मठों पर गलत आरोप लगाना धर्म के लिए खतरनाक - नरेन्द्रानन्द सरस्वती

Posted on 11 May 2010 by admin

तीर्थ भ्रमण पर चित्रकूट आए सुमेरुपीठ काशी के शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती ने मंगलवार पत्रकारों से भी मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने कहा कि मठ और पीठ पर आधिपत्य को लेकर विवाद करना गलत है क्योंकि जिस सुमेरुपीठ को आज स्वामी स्वरूपानन्द पीठ मानने से इंकार कर रहे हैं उन्होंने स्वयं दस वर्षो तक यहीं रहकर शिक्षा ली थी। अब उसी को पीठ न मानना गुरुद्रोह है। अगर द्वारिका पीठ के स्वामी स्वरूपानन्द उनसे इतने ही विद्वान है तो वे सार्वजनिक तौर पर शास्त्रार्थ करें। वे हमेशा इसके लिए तैयार हैं।

मंगलवार को पोद्दार इंटर कालेज सीतापुर के पूर्व प्रधानाचार्य रामभवन उपाध्याय के आवास में तीर्थ क्षेत्र भ्रमण में आए सुमेरुपुर काशी के शंकराचार्य नरेन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि लंबे समय से द्वारिका पीठ के स्वामी स्वरूपानन्द सुमेरुपीठ को पीठ ही मानने से इंकार कर आमजन के बीच स्वयं मजाक बन रहे हैं। क्योंकि इसी सुमेरुपीठ में 1962 से 1972 तक वे स्वयं रहकर शिक्षित हुए थे जिसमें उत्तर मध्यमा की परीक्षा में अनुत्तीर्ण भी हो गए थे। अब ऐसे में वे किस आधार पर सुमेरुपीठ पीठ नहीं मानते हुए अपने गुरू का ही द्रोह कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे स्वामी स्वरूपानन्द को चुनौती देते हुए सार्वजनिक रूप से शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि यदि स्वरूपानन्द स्वयं को शंकराचार्य मानते तो यह साबित करने के लिए उनसे देश के प्रमुख सन्तों, विद्वानों, आमजनता व मीडियाकर्मियों की मौजूदगी में शास्त्रार्थ करें। उन्होंने कहा कि जो भी इसमें हारेगा वह दूसरे का शिष्य कहलाएगा या फिर उसे  जीवित समाधि लेनी पड़ेगी।

वहीं उन्होंने बीते दिनों दिल्ली में सेक्स स्कैण्डल में पकड़े गए भीमानन्द के बारे में बोलते हुए कहा कि उसने कुछ समय पहले बातचीत के दौरान कहा कि वह स्वामी स्वरूपानन्द का शिष्य है। इस मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए और गेरुआ वस्त्रा धारण कर लोगों को भ्रमित करने वाले लोगों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कुंभ मेले के दौरान भी उन्होंने स्वामी स्वरूपानन्द के बयान पर चर्चा की थी। लेकिन वे सामने न आकर इधर-उधर से अपने बयान जारी कर रहे हैं। यह सन्त परंपरा के लिए गलत है। साथ ही उन्होंने कहा कि अनादि शंकराचार्य ने सुख शान्ति के लिए अपने चार पीठ बना इस संस्कृति को आगे बढ़ाया था लेकिन वर्तमान समय द्वेषभाव के चलते आज लगातार लोगों द्वारा कटाक्ष किया जा रहा है। जो धर्म के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

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